परिंदा रह जाता है बाक़ी सब घर आ जाते हैं – ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल

Spread the love

ग़ज़ल क्या है?

इस सवाल के जो सबसे पहले जवाब हमें मिलते हैं वो है कि उर्दू ग़ज़ल औरत से या औरत की बात करना है।
लेकिन अपने सैकड़ों साल के इतिहास में ग़ज़ल ने इस परिभाषा को कहीं पीछे छोड़ दिया है। अब ग़ज़ल सिर्फ़ महबूब की निगाहों और पेंच-ओ-ख़म तक का चक्कर नहीं लगती बल्कि ग़ज़ल का दायरा इतना बड़ा हो चला है कि दुनिया से सारे मसाइल और हर तरह के जज़्बे को ग़ज़ल में पिरोया जाने लगा हैं।
इस बात की गवाही देती ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल की शाइरी।
अगर हम ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल की शायरी को जानें तो बहुत ही कम ऐसे अश’आर मिलते हैं जो इश्क़ या यूँ कहा जाए कि महबूब के लिए अपने इश्क़ को बयाँ करते हों लेकिन ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल अपने शेर की कहन से जो असर पैदा करते हैं उससे इश्किया शाइरी की कमी महसूस भी नहीं होती।

आइए एक ग़ज़ल की जानिब आपको ले चलते हैं –

शब में दिन का बोझ उठाया दिन में शब-बेदारी की
दिल पर दिल की ज़र्ब लगाई एक मोहब्बत जारी की
(शब-बेदारी = रात भर जागना)

कश्ती को कश्ती कह देना मुमकिन था आसान न था
दरियाओं की ख़ाक उड़ाई मल्लाहों से यारी की

कोई हद कोई अंदाज़ा कब तक करते जाना है
ख़ंदक़ से ख़ामोशी गहरी उस से गहरी तारीकी
(तारीकी = अंधेरा)

इक तस्वीर मुकम्मल कर के उन आँखों से डरता हूँ
फ़सलें पक जाने पर जैसे दहशत इक चिंगारी की

हम इंसाफ़ नहीं कर पाए दुनिया से भी दिल से भी
तेरी जानिब मुड़ कर देखा या’नी जानिब-दारी की

ख़्वाब अधूरे रह जाते हैं नींद मुकम्मल होने से
आधे जागे आधे सोए ग़फ़लत भर हुश्यारी की

जितना इन से भाग रहा हूँ उतना पीछे आती हैं
एक सदा जारोब-कशी की इक आवाज़ भिकारी की

अपने आप को गाली दे कर घूर रहा हूँ ताले को
अलमारी में भूल गया हूँ फिर चाबी अलमारी की

घटते बढ़ते साए से ‘आदिल’ लुत्फ़ उठाया सारा दिन
आँगन की दीवार पे बैठे हम ने ख़ूब सवारी की

ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल की शाइरी में कुछ हासिल करने की बेचैनी के बजाए कुछ होने के इम्कान की तरफ ज़्यादा इशारा मिलता हैं।
कुछ और अश’आर देखते हैं-

 

वो बूढ़ा इक ख़्वाब है और ख़्वाब में आता रहता है
उस के सर पर अनदेखा पंछी मंडलता रहता है

इस दरिया की तह में ‘आ’दिल’ एक पुरानी कश्ती है
इक गिर्दाब मुसलसल उस का बोझ बढ़ता रहता है

– ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल

फिर बिस्तर से उठने की भी मोहलत कब ही मिलती है
नींद में आती हैं आवाज़ें, ख़्वाब में लश्कर आ जाते हैं

– ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल

अपने कहन के अंदाज़ से असर पैदा करने की दलील के लिए आइए पढ़ते हैं एक मशहूर ग़ज़ल

शुक्र किया है इन पेड़ों ने सब्र की आदत डाली है
इस मंज़र से देखो बारिश होने वाली है

सोचा ये था वक़्त मिला तो टूटी चीज़ें जोड़ेंगे
अब कोने में ढेर लगा है बाक़ी कमरा ख़ाली है

बैठे बैठे फेंक दिया है आतिश-दान में क्या क्या कुछ
मौसम इतना सर्द नहीं था जितनी आग जला ली है

अपनी मर्ज़ी से सब चीज़ें घूमती फिरती रहती हैं
बे-तरतीबी ने इस घर में इतनी जगह बना ली है

देर से क़ुफ़्ल पड़ा दरवाज़ा इक दीवार ही लगता था
उस पर एक खुले दरवाज़े की तस्वीर लगा ली है

हर हसरत पर एक गिरह सी पड़ जाती थी सीने में
रफ़्ता रफ़्ता सब ने मिल कर दिल सी शक्ल बना ली है

ऊपर सब कुछ जल जाएगा कौन मदद को आएगा
जिस मंज़िल पर आग लगी है सब से नीचे वाली है

इक कमरा सायों से भरा है इक कमरा आवाज़ों से
आँगन में कुछ ख़्वाब पड़े हैं वैसे ये घर ख़ाली है

पैरों को तो दश्त भी कम है सर को दश्त-नवर्दी भी
‘आदिल’ हम से चादर जितनी फैल सकी फैला ली है

– ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल

यह कहना भी ग़लत नहीं होगा कि ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल के ज़हन में अपनी एक दुनिया है जो हम सबके ज़हन में होती है, एक दुनिया जो इस मयस्सर दुनिया से मुख़्तलिफ़ है लेकिन अपनी उस ना-मौजूद दुनिया को बयाँ करने का जो अंदाज़ ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल का है वही अंदाज़ उन्हें बाकी सब से जुदा करता है, हसरतों के चलते दिल पर पड़ने वाली गिरह और उस गिरह से बनने वाली शक्ल का अल्फ़ाज़ से बना स्कैच।

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल बहुत नर्म जज़्बात को ऊन की तरह अपने कलम के क्रोशिए से बुनते हैं। कुछ अश’आर देखें-

बैठे बैठे इसी ग़ुबार के साथ
अब तो उड़ना भी आ गया है मुझे
——————————————————–
रवानी में नज़र आता है जो भी
उसे तस्लीम कर लेते हैं पानी
——————————————————–
यूँ उठे इक दिन कि लोगों को हुआ
अब्र का धोका हमारी ख़ाक पर
——————————————————–
चर्च की सीढियाँ, वाइलन पर कोई धुन बजाता हुआ
देखता है मुझे इक सितारा कहीं टिमटिमाता हुआ
———————————————————
सुनते हैं जो हम दश्त में पानी की कहानी
आज़ार का आज़ार कहानी की कहानी
——————————————————–
इक ऐसे शहर में हैं जहाँ कुछ नहीं बचा
लेकिन इक ऐसे शहर में क्या कर रहे हैं हम
——————————————————–
किस तरह समझाएँ की हज़रत! समझो
दिल को दुनिया की तरह मत समझो

तुम मुझे कुछ भी समझ सकते हो
कुछ नहीं हूँ तो ग़नीमत समझो

– ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल

ख़ास बात यह है कि आ’दिल यही असर अपनी पूरी ग़ज़ल में एक जैसी रवानी के साथ जारी रखने में कामयाब रहते हैं और कई बार यह कहना मुश्किल हो जाता है कि पूरी ग़ज़ल में वो शेर कौनसा रहा होगा जिसने शायर को एक नई ग़ज़ल कहने पर मजबूर किया। एक कुछ ग़ज़लें ग़ज़ल देखते हैं –

जाने हम ये किन गलियों में ख़ाक उड़ा कर आ जाते हैं
इश्क़ तो वो है जिस में ना-मौजूद मयस्सर आ जाते हैं

जाने क्या बातें करती हैं दिन भर आपस में दीवारें
दरवाज़े पर क़ुफ़्ल लगा कर हम तो दफ़्तर आ जाते हैं

काम मुकम्मल करने से भी शाम मुकम्मल कब होती है
एक परिंदा रह जाता है बाक़ी सब घर आ जाते हैं

अपने दिल में गेंद छुपा कर उन में शामिल हो जाता हूँ
ढूंढते ढूंढते सारे बच्चे मेरे अंदर आ जाते हैं

मीम मोहब्बत पढ़ते पढ़ते लिखते लिखते काफ़ कहानी
बैठे बैठे इस मकतब में ख़ाक बराबर आ जाते हैं

रोज़ निकल जाते हैं ख़ाली घर से ख़ाली दिल को ले कर
और अपनी ख़ाली तुर्बत पर फूल सजा कर आ जाते हैं

ख़ाक में उँगली फेरते रहना नक़्श बनाना वहशत लिखना
इन वक़्तों के चंद निशाँ अब भी कूज़ों पर आ जाते हैं

नाम किसी का रटते रटते एक गिरह सी पड़ जाती है
जिन का कोई नाम नहीं वो लोग ज़बाँ पर आ जाते हैं

फिर बिस्तर से उठने की भी मोहलत कब मिलती है ‘आदिल’
नींद में आती हैं आवाज़ें ख़्वाब में लश्कर आ जाते हैं

– ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल
——————————————————————-
सारा बाग़ उलझ जाता है ऐसी बेतरतीबी से
मुझमें फैलने लग जाती है ख़ुशबू अपनी मर्ज़ी से

हर मंज़र को मजमे में से, यूं उठ उठ कर देखते हैं
हो सकता है शोहरत पा लें हम अपनी दिलचस्पी से

इन आँखों से दो इक आँसू टपके हों तो याद नहीं
हमने अपना वक़्त गुज़रा हर मुम्किन ख़ामोशी से

बर्फ़ जमी है मंज़िल मंज़िल, रस्ते आतिशदान में हैं
बैठा राख कुरेद रहा हूँ मैं अपनी बैसाखी से

ख़्वाबों के ख़ुशहाल परिंदे, सर पर यूँ मंडलाते हैं
दूर से पहचाने जाते हैं हम अपनी बेख्वाबी से

दिल से निकाले जा सकते हैं, खौफ़ भी और ख़राबे भी
लेकिन अज़ल, अबद को आ’दिल कौन निकालने बस्ती से

– ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल
—————————————————————–

ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल की पहली किताब 2015 में आई थी लेकिन गौरतलब है कि पेशे से इंजीनियर आ’दिल शाइरी के अलावा कहानियां भी लिखते हैं और थिएटर के लिए निर्देशन और अदाकारी भी कर चुके है। इसके अलावा कुछ गीतों के ज़रिए टेलीविजन की दुनिया से भी आ’दिल अछूते नहीं रहे।

ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल की शाइरी इस बात की मिसाल क़दम क़दम पर पेश करती हैं की अपने क्राफ्ट के दम पर कैसे पढ़ने वाले को बांधे रखा जा सकता है।


Spread the love

himanshu pandey

ये लड़के बीस बाइस के

One thought on “परिंदा रह जाता है बाक़ी सब घर आ जाते हैं – ज़ुल्फ़िक़ार आ’दिल

  • August 11, 2020 at 4:20 pm
    Permalink

    Bahut khoobsurat❤️❤️❤️❤️

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: