लिपिबद्ध प्रेम

Spread the love

भाषा हमें वैसाखी देती है, इस दुनिया में अपनी भावनाओं को बहने देने को, पर उससे पहले ही भाषा हमारी भावनाओं को एक फीते से बांध देती है, जैसे सबकुछ अब हम उसी टर्म्स में सोचें, कहें और फिर कहन का अर्थ निकालें.

वह मेरी भाषा रही थी और मैं उसकी लिपि. भाषाएं भूली नहीं जाती, भूला दिए जाते हैं बिम्ब, गुम हो जाता है अलंकार पर शेष रहता है उसमें गुम होने और भूल जाने का तीखापन. मैं उसे कितना ही भूलने की कोशिश करता, कितना ही उसे देहों की लिपि में गुमाने की कोशिश करता, सब फेल. वह मेरे ज़ेहन में – बाल्यावस्था से किशोर और फिर किशोरी बन कर छप चुकी थी.

प्रेम को प्रेम सीधे सीधे कहना मुझे नहीं आया. मैं हमेशा उसे जरूरत, पसन्द, और टेंशन के मैप पर स्केच करते आया था. मैं एक आर्टिस्ट था, मेरा आर्ट था अलग अलग रंगों का चोला पहना हुआ प्रेम.

लेख़क प्रेम को ही जाँचते रहे हैं, वैज्ञानिकों के सारे सोध प्रेम की उतपत्ति खोजते हैं, ब्रम्हांड का असल सत्य प्रेम से उपजा है, संगीत का पहला सुर प्रेमियों का चुम्बन था, पेंटर प्रेम को एब्सट्रेक्ट और मॉडर्न टर्म्स में गढ़ते हैं. प्रेम एक सब्सटांस है जो जीवन की जरूरत है.

जरूरत होना किसी की, आपको अधिकार देता है, दमन करने का, आपके पास एक अपर हैंड होता है पावर डायनामिक्स में. प्रेम विद्युत के ठीक उलट, लो से हाई की ओर बहता है. प्रेम थ्योरमस से परे है.

उसको एक समय पता लग गया था की वो मेरी जरूरत है. मैनें ये कभी कहा नहीं पर मेरी देह की आवाज़ ये चीख रही थी. जब प्रेम को देह की धुरी पे ड्रा करने के बाद, अगल-बगल, पैरलेक्स को खत्म कर के एक तारे की दूरी अपने से नाप रहे थे, मैनें अचानक से अपनी नजरें बन्द कर ली थीं. दूरी का कांसेप्ट ही मुझे अजीब लगा. करीब होने पर दूरियों की बातें नहीं करनी चाहिए. उसने मेरा आँख बन्द करना सुन लिया था. कुछ देर बाद उसने मौन की गर्भ से एक ब्रम्हास्त्र निकाला – ” हमें लगता है, अब हम इसे कंटिन्यू नहीं रख सकते, यू नो व्हाट आई मीन” – मैं नहीं जानता था वो क्या मीन करती है पर मैंने आंख मूंदे ही उसे जाने की अनुमति दे दी.

मैं अगर सोया होता तो शायद मेरे हाथ उसके हाथ को पकड़ लेते और हम ब्रम्ह की बनाई मानव-मूर्ति बन जाते. पर मैं जगा हुआ था, जगे हुए इंसान कल्पना की फिजिक्स नहीं जानते, वे बस अपने कद की बराबर के सत्य को नकार देते हैं. और “व्हाट यू मीन” तो अप्रत्यक्ष रूप से मेरे से कई गुना बड़ा था.

आँखें मूंदे हुए मुझे नींद आ गई. आँसू मेरे आँखों के अंदर बनते और निकलने का रास्ता ना पाकर घुट कर मर जाते. मुझसे हत्या होती जा रही थी. उनकी चीख मेरे कानों पर ड्रम्स की तरह बज रहे थे, पर मैं उसे आँख भींच कर और दबा देता.

मेरे आँखों के नीचे गिल्ट के काले बादल दिखाई देने लगे. मेरे शरीर के खून में नमक बढ़ने लगा था. मैं समुन्द्र होता जा रहा था, जिसके बाहरी सतह पर वर्षों की निद्रा की शांति हो.

वह चली गई थी. मैं सागर हो गया था.


Spread the love

avinash mishra

एक शब्द जिसका उच्चारण भुला दिया गया हो. मेरा लिखना, पढ़ना, देखना और सुनना - उसी उच्चारण को जानने का प्रयास है.

One thought on “लिपिबद्ध प्रेम

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: