“शर्तें लागू”, दिव्य की कहानी संग्रह

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शर्तें लागू, दिव्य की कहानी संग्रह “terms and conditions apply” का दूसरा संस्करण हैं. इस किताब को हिंद युग्म प्रकाशन ने पब्लिश किया है।

कुछेक कहानियाँ काफी ख़ूबसूरत लगती हैं और कुछेक के बारे में ऐसा लगता हैं कि यूंही किताब को मोटी दिखाने के चक्कर में डाल दी गयी हो.
फिर जैसा अक्सर किसी कहानी संग्रह में होता हैं. दिव्य के कहानी संग्रह में भी  कुछेक कहानियाँ एक दुसरे की पूरक जान पड़ती हैं.पाठक कन्फ्यूज़्ड हो जाता है पर संभल के दोनों की गहराई को जोड़ देता है।
सारी 14  कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता हैं कि दिव्य ने कहानियाँ जोड़ो के हिसाब से लिखी हो. जिसमे किरदार का अंत एक कहानी में सुखद हैं तो दूसरी  में  दुखद. दुखद अंत  को अधूरा छोड़ देने का प्रयास है जिसे पढ़ने वाला इमोशनल हो कर अपने हिसाब से पूरा करने का सोचता है।
दिव्य खुद भी अपनी कहानी “कागज़” में लिखते हैं, “उसका हर किरदार अलग होते हुए भी एक था. वह वही किरदार बार-बार करता है. यह बात दुनिया में केवल दो लोगों को पता थी. एक उसे और एक मुझे.”
तो एक कहानी में उन्होंने अकेलापन को ऐसे परिभाषित किया है की, “कई बार अकेलापन भीड़ देख कर टूट पड़ती है.”
इस संग्रह की एक कहानी – जिसमें भारत के बाहर जा कर पढ़ने वाली एक सामान्य लड़की और उसके साथ टांकी गई सामाजिक इज्जत को इंगित करते हुए लिखते हैं – “घर की इज्जत और लड़की के प्यार में कितना गहरा सम्बन्ध होता है, ये पहाड़ा हर उस लड़की को पढ़ाया जाता है जो कही बाहर पढ़ने के लिए जा रही है.” इनके किरदारों के कई पहलू ऐसे हैं जो जीवन को बहुत करीब से देखे जाने वाले अनुभवों को साझा करते हैं. पाठक इन कहानियों के साथ अनुभवों को अपने साथ लेकर जाता है.
इसके अलावा उनकी हर कहानी सुनी-सुनाई लगती हैं. एक परिचित सा जान पड़ते हैं हर किरदार. उनके किरदारों के बारे में ऐसा लगता है कि अभी ही तो मिले थे इस किरदार से. शायद, असल दुनिया में या फिर दूसरी किसी किताब में. बस इधर इन किरदारों के नाम बदलकर पारुल, शैफाली, शिवम, राहुल, किट्टी, पुत्तन, नम्रता या पल्लवी रख दिए हो.
शेक्सपीयर ने कहा है कि नाम में क्या रखा है, ठीक उसी तरह इनके किरदारों के नाम जो भी हों उन्हें आप अपने परिचितों से जोड़ कर ही देखते हैं.
संग्रह की कई कहानियां अपने भीतर एक अधूरापन लिए फिरती हैं जिसे पाठक अपने अपने हिस्से में संजो कर उसमें पूर्णता का संचार करते हैं. जब आपको किसी कहानी के लिए काम करना पड़े तो आपके ज़हन में वह बस जाती है. दिव्य की इन कहानियों में ही उनकी सफलता है जो अपने अधूरेपन में ही फलती फूलती हैं और फिर पाठक उनका रस खुद बनाता है.
अंत में यही कहूंगा कि शर्तें लागू, एक बार पढ़ने लायक किताब जरूर हैं. कहानियों, किरदारों और दिव्य के लेखन – इन तीनों के समागम के लिए एक बार जरूर पढ़ा जाना चाहिए. 
नई हिंदी यदि आपका इमेडियेट समाज का किताबी करण है तो यह किताब उस मामले में सफल होती हुई दिखती है.
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लेखक -आकाश मिश्र
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र, जिसकी रुचि – साहित्य, सिनेमा और समाज – के गलियारों से होकर गुजरती है और सबकी गमक अपने भीतर संजो लेती है.

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