शबाना आज़मी: जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं!!

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मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी और थिएटर अदाकारा शौकत आज़मी की बेटी शबाना ,जब किसी अंग्रेज़ी स्कूल में एडमिशन के लिए गयी, तो पता लगा कि दाखिले के लिए माँ बाप को अंग्रेजी आनी जरूरी है। उनके माता पिता की हिंदी और उर्दू तो माशाअल्लाह बेहद दुरुस्त थी, मगर अंग्रजी भाषा में दोनों के हाथ तंग ही थे। लेकिन दौर बदल रहा था, बच्ची को अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाने का सपना देखते माँ बाप ने एक तरकीब निकली और अपने फ़र्राटेदार अंग्रेजी बोलते दोस्तों को बनाया शबाना के माँ बाप, और हो गया उनकी बेटी का दाखिला, एक अच्छे अंग्रेजी स्कूल में।

इस रोचल किस्से का विवरण किया है, शबाना आज़मी ने, हाँ वही शबाना आज़मी, जिनका अभिनय हमेशा कुछ जिया हुआ सा लगता है, अभिनय की कलात्मकता कहीं छिप जाती है और हमे नज़र आता है तो सिर्फ एक मनुष्य अपने पूर्ण भावों के साथ।

यह कहना कि घर में सभी कलाकार थे तो शबाना आज़मी का कलाकार होना कोई अलग बात तो है नहीं, सामाजिक रूप की धारणा है, मगर हर कलाकार की अपनी यात्रा होती है और यह यात्रा हमें उनकी फिल्मों में दिखाई दी। श्याम बेनेगल की फ़िल्म “अंकुर” शबाना आज़मी की पहली रिलीस फ़िल्म और FTII से निकली शबाना आज़मी को इस फ़िल्म के लिए मिलता है, नेशनल फ़िल्म अवार्ड फ़ॉर बेस्ट एक्ट्रेस और इसके बाद की यात्रा के हम सभी साक्षी हैं।

कहते हैं मनुष्य हमेशा अपने चुनावों से परखा जाता है,और शबाना आज़मी की फिल्मोग्राफी देखकर हमें उनका कलाकार दिखाई देता है। “एक डॉक्टर की मौत”, “मंडी”, “फायर”, “स्पर्श”,”मासूम”, “मकड़ी”, “अपने पराए” और न जाने कितनी फिल्में में इस अदाकारा के इतने अलग अलग किरदार हैं कि इस अदाकारा को किसी खांचे में रखना कला का अनादर ही होगा। उन्होंने हमेशा उस सिनेमा का चुनाव किया जो उस समय के ढर्रे से अलग था, जिसे आज हम पैरलल सिनेमा कहते हैं, वह सिनेमा जहाँ कहानियाँ प्राथमिकता थी और कलाकार उसका हिस्सा। आज के सिनेमा की बढ़ोतरी उसी पैरलल सिनेमा से हुई और उसकी नींव पर हमें शबाना आज़मी भी दिखाई देती हैं। इस सिनेमा की लीडिंग एक्ट्रेस ने रूप में स्थापित हुई शबाना आज़मी आज भी उसी सिनेमा को प्रतिनिदित्व करती हैं।

कला तभी मायने रखती है जब वह समाज के बदलाव के लिए काम आए, इसी सोच के साथ चलती, शबाना आज़मी आजकल आपको बहुत से सामाजिक कार्य करती नज़र आएंगी। हमेशा से एक सच्ची आवाज़ रही है शबाना, जिन्होंने हर मुद्दे पर खुल कर बात की है और अपना मत मानवता से पक्ष में रखा है।

कुछ समय पहले उनके साथ एक भयानक सड़क दुर्घटना हुई,और उसके चालीस दिन बाद वह किसी फिल्म की शूटिंग कर रही थी, इस पर एक पत्रकार ने पूछा, इतने भयानक एक्सीडेंट के बाद भी आप काम कैसे कर रही हैं, दर्द नहीं हो रहा, तो सत्तर साल की शबाना जी अपने प्यारे अंदाज़ में कहती है” मेरे अब्बा कहते थे ‘दर्द अपना काम कर रहा है ,मैं अपना’ शायद उन्हीं के जीन्स हैं”. इस तरह की मट्टी से बनी यह अदाकारा जीवन की एक मिसाल है। इनकी अदाकारी, इनके सामाजिक कार्य, और इनके जीवन से सच्चाई का बहाव इतना सहज है कि आपको यह व्यक्तित्व सामाजिक ढकोसलों से दूर पूर्ण रूप से प्राकर्तिक लगेगा।

शबाना आज़मी के अब्बा कैफ़ी आज़मी साहब के एक नज़्म है “औरत”
‘उड़ने खुलने में है नकहत,खमे गेसू में नहीं
जन्नत इक और है जो मर्द के पहलू में नहीं
उसकी आज़ाद रविश पर भी मचलना है तुझे
उठ मेरी जान,मेरे साथ ही चलना है तुझे’

आज भी जब यह नज़्म दिलो दिमाग मे घूमती है, नज़र आती हैं अपने अब्बा की शबाना,वह शबाना जिसने जी है यह नज़्म और किये हैं अपने सारे सपने साकार, और आज भी सत्तर साल की शबाना आज़मी अपनी बेधड़क, खुली आवाज़ में गा रही हैं जीवन के संगीत पर तैरती यह नज़्म।


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