जिस देश का बाल साहित्य समृद्ध नहीं है, उसका भविष्य उज्ज्वल नहीं रह सकता : सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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यह कथन उस व्यक्ति का है जिसने छठी कक्षा में पहली कविता लिखी और नवीं कक्षा में ‘आर्यमित्र’ पत्रिका में प्रकाशित हुए।

एक ऐसा साहित्यकार जिसने बाल साहित्य को बहुत सी कहानियां व कविताएं देकर भविष्य को फलीभूत करने का प्रयास किया।सर्वेश्वर दयाल सक्सेना एक अध्यापक,क्लर्क,आकाशवाणी के प्रोड्यूसर, कहानीकार ,उपन्यासकार,कवि,सम्पादक और पत्रकार के रूप में पहचाने जाते हैं।

तेजस्वी चेहरा,बिल्कुल सादा पहनावा,आकर्षित करती मुस्कान,खनकदार आवाज़ सबका मन मोह लेती थी।उनकी कविताओं में क्रांति का जो चित्र था उसकी झलक उनकी आंखों में साफ दिखती थी।अज्ञेय के तीसरे तारसप्तक में अपना परिचय देते हुए वे कहते हैं,

“स्वभाव न अच्छा न बुरा बाहर से गम्भीर सौम्य पर भीतर वैसा नहीं,विपत्ति,संघर्ष,निराशाओं से घनिष्ठ परिचय के कारण ज़रूरत पड़ने पर खरी बात कहने में सबसे आगे। अपनों के बीच बेगानों से रहने की और बेगानों को अपना समझने की मुख्य आदत काहिली,सुस्ती,सोचना अधिक करना कम,अपनी लीक पर चलना और किसी की परवाह न करना; ये कुछ मुख्य दोष हैं,दुसरो की दृष्टि में मेरे”

सर्वेश्वर का रचना संसार

15 सितंबर 1927 को बस्ती जिले (उत्तरप्रदेश) में जन्में इस कवि की कविताओं में पर्यावरण का सौंदर्य है,ग्रामीण जीवन का चित्रण है
सिमटते गांवो पर शहरीकरण के प्रभाव को देखते हुए वो कहते हैं,

आस्था के नाम पर मूर्खता,
विवेक के नाम पर कायरता,
सफलता के नाम पर नीचता,
मुहर की तरह हर व्यक्ति पर लगी हुई है,
और एक लाश दूसरी लाश को
इन्हीं सांचो में ढालती जाती है
इस मृत नगर में!

उनका मानना था कि पत्रकारिता में आज की बात की जाती है,जबकि साहित्य कालजयी होता है।जो बात वह कविता में नहीं कह सकते थे उसे पत्रकारिता के माध्यम से दूसरों तक पहुंचाते थे। तुम्हारे साथ रह कर,सब कुछ कह लेने के बाद,तुम्हारे लिए,तुम्हारी मुस्कान जैसीअन्य कई कविताओं में प्रेम के गहरे रंग भी सर्वेश्वर के रचना संसार की ओर पाठकों को आकर्षित करते हैं।उनका मित्र वर्ग मुक्तिबोध,श्रीकांत वर्मा,अज्ञेय,प्रयाग शुक्ल जैसे कवियों से सजा हुआ था।मुक्तिबोध की मृत्यु पर वे लिखते है,

तुम्हारी मृत्यु में
प्रतिबिम्बित है हम सब की मृत्यु
कवि कहीं अकेला मरता है!

पत्र पत्रिकाओं में सम्पादन के कारण राजनीतिक गतिविधियों में उनकी हिस्सेदारी सक्रिय रही।आजादी के बाद के माहौल ने उन्हें बहुत प्रभावित किया,उनकी कविताओं में विद्रोह यहीं से उपजा।इंदिरा गांधी की नीतियों पर वे न रोष प्रकट करते हुए हिचकिचाते थे,न ही व्यंग्य करते हुए।उनका कहना था ‘अन्याय,शोषण का विरोध हर काल का सही कवि अपनी- अपनी तरह से करता है और मैं यही कवि धर्म मानता हूं।’बकरी नाटक ऐसी ही एक रचना है जो जनता को सत्ता के ढंग से अवगत करवाती है।आपातकाल के समय इस नाटक पर इंदिरा जी द्वारा रोक लगा दी गई थी।

चुनाव लड़ने वालों!
तुम किसी भी पार्टी में क्यों न हो
ले जाओ नया नारा
इतना लगाओ, इतना लगाओ
कि फट जाए आसमान सारा
‘इंदिरा गांधी ज़िंदाबाद
बाकी दुनिया मुर्दाबाद’

एक आज का दौर है जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुख से इनकी पंक्तियां संसद में गूंजती है।

लीक पर वे चले जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पंथ प्यारे हैं।

‘काठ की घंटियाँ’से ‘खूंटियों पर टँगे लोग’ तक का उनका यह सफ़र 24 सितंबर 1983 को मधुमेह की शिकायत के कारण समाप्त हो गया।उनके समय में हिंदी कविता तुकबंदी से घिरी हुई थी,उन्हें इस शैली में कोई दिलचस्पी नहीं थी।ईश्वर में उनकी कोई श्रद्धा नहीं थी,पर वे ईश्वर की दी हुई शक्तियों का सम्मान करते थे।सर्वेश्वर का लेखन कालजयी ही है चूंकि वह कविताएं,कहानियां आज भी प्रासंगिक हैं।

इनकी रचनाएं आज के युवा को जोश देती,प्रकृति से जोड़ती,प्रेम की छाप छोड़ती व अपनी आत्मशक्ति को जाग्रत करती हैं।साहित्य अकादमी प्राप्त यह रचनाकार केवल आंकड़ो से नहीं बल्कि अपनी रचनाओं से अपना होना प्रमाणित करता है।


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