रिया या कंगना से पहले, दिक्कत समाज की सड़ चुकी मानसिकता और नैतिकता में है…..

Spread the love

परिकल्पना आकलन में कहाँ चूका समाज

समाज का दोगलापन और मरता ज़मीर हर रोज़ नए आयाम गढ़ रहा है, एक तरफ़ उस लड़की को Y+ सुरक्षा दे दी जाती है जिसने मौत को महज़ एक बिज़नेस ऐलीमेंट बनाकर रख दिया है तो वहीं उस लड़की के साथ देश का मीडिया और तथाकथित सभ्य समाज का जानवरों जैसा व्यवहार करता है जो पूरे केस में अभी केवल एक आरोपी है, सीबीआई की जाँच जारी है। यदि आरोप साबित होते भी हैं तो उसे सजा देने के लिए देश में विधिवत एक न्यायपालिका है, सीबीआई की जाँच के बाद का कॉलम न्यायपालिका का ही है।

डिेबेट और न्यूज़ के नाम पर एंटी-मोरैलिटी नैरेटिव का भौंडा प्रदर्शन करने वाले एक अति राष्ट्रवादी और जाहिल एंकर को देश की पढ़ी लिखी और बुध्दिजीवी जनता स्टार बना देती है, जिस चैनल पर लाइव प्रसारण के दौरान एक मीडियाकर्मी बिना झिझके एक भद्दी गाली दे सकता है,

cyber bullying concept. people using notebook computer laptop for social media interactions with notification icons of hate speech and mean comment in social network

उस चैनल की टीआरपी 20 का मीटर पार कर जाती है। इस चैनल को डिफ़ेंड करने के लिए जो भी मासूम या पढ़ा लिखा कमेंट में आ कर ज्ञान देना चाहता है उसको मेरी यही सलाह है कि पहले इस चैनल का कंपनी स्ट्रक्चर पढ़ कर आए फिर यहां विमर्श करे या सवाल उठाए अन्यथा अपना दाँव खुद पर ही उल्टा पड़ने के सौ फ़ीसद संभावना हैं।

आखिर कहाँ हार गए हम ?

उस जाहिल एंकर और उसके सड़कछाप चैनल की टीआरपी बढ़ाने का ये कमाल देश के उन्ही लोगों का है जो रोज मीडिया के गिरते स्तर पर चिंतित रहते है, कमाल की बात है न, खुद को चाहिए एंटरटेनमेंट ही और फिर चैनल्स से उम्मीद करते हैं कि वो सरोकारों की बात करें, और जो सरोकारों की बात करते हैं वो इनके हिसाब से पागल और देशद्रोही होते है।

तो चलिए, ज्यादा लंबा न करते हुए, जिस मसअले को लेकर बात शुरू की थी उस की तहें खोल ली जाएं। बात दरअसल ये है कि इस तथाकथित मर्दवादी और स्टीरियोटिपिकल मानसिकता से ग्रस्त समाज का शुरू से ही ये पैटर्न रहा है कि इस समाज ने नारी का सम्मान हमेशा अपनी संकीर्ण अवसरवादी मानसिकता के दायरे में ही किया है। इस बार सबको दिख रहा था कि तथाकथित सोशल नैरेटिव रिया के खिलाफ़ है,

Trolling kangana and riya chakraborty
Social media trolling, fake, anger, bullying and scandal signs.

ये वही नैरेटिव है जिसे नैतिकता के पैमाने पर विशुद्ध रूप से एक अपराध बताया गया है और वो इसलिए क्योंकि इस नैरेटिव में एक आरोपी को बेशर्म मीडिया के चलाए गए ट्रायल के जरिए अपराधी घोषित किया जाता है।

क्या है पूरी स्थिति का आकलन ?

सुशांत ने आत्महत्या की, उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया या फिर उनकी हत्या की गई, इस पूरे मामले की जाँच चल रही है, जो भी सीबीआई जाँच से निष्कर्ष निकलेगा या कोर्ट ऑफ़ जस्टिस से जो भी टिप्पणी आएगी, वो ही हम सबको स्वीकार करनी होगी लेकिन उससे पहले हमें मानवीयता के मानकों पर इन बातों का

मूल्यांकन करना होगा कि :

1. समाज में मानवता का स्तर क्या रहा?
2. नारी के सम्मान में समाज अवसरवादी क्यों हुआ?
2. मीडिया के गिरने की हदें क्या थी?
3. हमने मीडिया के भौडेपन को क्यों और कैसे फ़लने-फ़ूलने दिया?

इन तीन सवालों के अलावा भी एक सबसे बड़ा सवाल तथाकथित बुद्धिजीवियों की मानसिकता और परवरिश पर भी उठता है, संजय राउत के बयान को किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता, जन-प्रतिनिधि होने के नाते एक महिला के लिए ऐसे शब्दों के प्रयोग को कभी भी एकनॉलेज और प्रमोट नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर आप मौत को बिज़नेस ऐलीमेंट बनाने वाली कंगना के फ़ूहड़पन और अवसरवादी मानसिकता के साथ खड़े हो सकते हैं और उसके खिलाफ़ आने वाले बयानों को स्त्री का अपमान कहते हैं तो आपको रिया के साथ हुए मीडिया के वहशीपन के खिलाफ़ भी स्टैण्ड लेना होगा। वो लड़की अभी महज़ एक आरोपी है, सीबीआई की पूछताछ और जाँच जारी है, अगर आप रिया के साथ खड़े नहीं हो सकते, उसके साथ की गई मीडिया की दरिंदगी और बदसलूकी को अपराध कहने की या उस बदतमीज़ी को स्त्री का अपमान कहने की हिम्मत नहीं कर सकते हैं जिसमें रिया की जान जाने का भी खतरा था तो माफ़ करना दोस्त आप खोखली मनोरंजक और टीआरपी वाली मानसिकता, दोगलेपन और अवसरवादिता से बुरी ग्रस्त हैं।

क्या है इस विमर्श का निष्कर्ष ?

इस पूरे विमर्श को निष्कर्ष की ओर ले जाते हुए आप सब से बस यही अपील है कि समय रहते मीडिया के वर्तमान चेहरे को नकार दीजिए, अपनी चेतना और नागरिक बोध को मीडिया के हाथों मारे जाने से बचा लीजिए, अगर मौत को बेचने वाली कंगना की डिगनिटी आपके लिए मायने रखती है तो ये भी समझ लीजिए कि अपराध साबित होने से पहले आरोपी केवल आरोपी ही होता है इसलिए रिया की डिगनिटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, वो भी एक स्त्री है, उसके सम्मान का बचा रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आप खुद नहीं जानते कि मीडिया का ये दूषित हो चुका चेहरा आपकी मानवीय मानसिकता और नैतिकता को किस तरह विकृत कर रहा है।

कैसे बच सकते हैं आधारभूत सिद्धांत ?

अपने आत्मसम्मान, मानवीय मूल्यों और सिद्धांतों को बचाने के लिए आपको हर हाल में मीडिया के इस वर्तमान चेहरे को नकारना होगा और उसे वापस अपने कार्यक्षेत्र के नैतिक मूल्यों और सिद्धांतों की ओर लौटने पर मजबूर करना होगा ताकि पत्रकारिता फिर से सरोकारों की बात करें और मज़लूमों की आवाज़ बन सके, इस तरह पत्रकारिता के साथ-साथ आपकी मानवता, नैतिकता और आँखों के पानी को दोनों समान रूप से बचाया जा सकता है।

 


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: