पलाश सेन – हिंदुस्तान का पहला हिंदी रॉक सिंगर

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आज के दौर में रॉक बैंड्स में हिंदी गाने गाना कोई अलग और चौंकाने वाली बात नहीं है पर एक दौर ऐसा था जब रॉक बैंड्स मतलब सिर्फ अंग्रेज़ी गाने होते थे। कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कोई रॉक म्यूज़िक पर तबले और बाँसुरी की धुन पर हिंदी गाने गा सकता है। तब उस दौर में पलाश सेन ने ऐसे गाने गाकर भारत के पहले हिंदी रॉक बैंड यूफोरिया को जन्म दिया। आज यूफोरिया बैंड के फाउंडर, लीड सिंगर, म्यूजिक कम्पोज़र, गीतकार डॉ पलाश सेन का जन्मदिन है।

पलाश का जन्म 23 सितम्बर 1965 को लखनऊ में हुआ था। उनके माता पिता दोनों ही पेशे से चिकित्सक थे। उनके जन्म के पश्चात वह दिल्ली आ गये।

उनकी स्कूली शिक्षा दिल्ली के सेंट कोलम्बस स्कूल से हुई। जिसके बाद उन्होंने विश्वविद्यालय के कॉलेज ऑफ मेडिकल साइंसेज नई दिल्ली में अध्ययन किया और एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की।

यूफोरिया का आग़ाज़

पलाश कई इंटरव्यूज में बताते हैं कि बैंड की शुरुआत उन्होंने कॉलेज के दिनों में लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए की थी। फिर उस दौरान उन्हें गीत लिखने और कंपोज़ करने का भी चस्का लगा। कॉलेज में उनका लिखा पहला गीत था “हेवन ऑन सेवेंथ फ्लोर“, क्योंकि वो होस्टल के सेवेंथ फ्लोर पर रहते थे।

टीवी 18 के एक इंटरव्यू के दौरान पलाश ने एक गीत गाया “माँ मैं हारा नहीं”, जिसे सुनकर आर्चीज़ म्यूजिक ने उन्हें एक एल्बम बनाने की पेशकश की । इस तरह अपने पहले एल्बम “धूम” के साथ यूफोरिया ने 1998 में प्रोफेशनल रॉक बैंड के रूप में शुरुआत की । इस एल्बम का “धूम पिचक” गीत ज़बरदस्त हिट हुआ । एक और गीत “दिल्ली” भी जब साल 2010 में रिक्रिएट किया गया तो कॉमनवेल्थ गेम्स की पहचान बना ।

तब से यूफोरिया के अब तक सात एल्बम आ चुके हैं।

1998 – धूम

2000 – फिर धूम

2001- मंत्रा

2003 – गली

2006 – महफूज़

2008 – रीधूम

2011 – आइटम

ज़िन्दगी एक भ्रम है –

पेशे से ऑर्थोपेडिक्स सर्जन डॉ पलाश का मानना है कि ज़िन्दगी का सबसे बड़ा सच बीमारी और मौत होता है, ज़िन्दगी एक भ्रम है और हम ये भ्रम जीते जा रहे हैं। इसलिए पलाश बिना किसी चीज़ को ज़्यादा सीरियसली लिये ख़ुद खुश रहने और दूसरों को खुश रखने में विश्वास करते हैं । उनके गीतों में खुश रहने का यही अंदाज़ साफ तौर से दिखता है।

कहाँ गायब हुआ यूफोरिया –

जब से फिल्मों में गानों को वरीयता दी जाने लगी, हिंदुस्तान में म्यूजिक एलबम्स की संख्या में भारी गिरावट आयी और अधिकतर रॉक बैंड्स गायब हो गए। म्यूजिक इतना सस्ता हुआ कि लोगों ने म्यूजिक एलबम्स पर पैसे लगाने बंद कर दिए और इंडिपॉप गानों का सुनहरा दौर ख़त्म हो गया। यूफोरिया के साथ लकी अली, सिल्क रूट जैसे तमाम इंडिपॉप अब बस नास्टैल्जिया में ही हमारे साथ बचे हैं।

उम्मीद करते हैं कि एलबम्स की अहमियत फिर पहचानी जाये और सुनहरा दौर वापिस आये।
धूम मचाने वाले पलाश सेन को जन्मदिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

कुछ ख़ास गीत जो पलाश सेन या यूफोरिया का नाम लेते ही ज़हन में आते हैं –

https://youtu.be/foundations

आप भी सुनिए और बताईये आपको कितने गाने याद हैं ?


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