ओह शापित एटलस !

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कूबड़

जब भी किसी ऐसे व्यक्ति को देखता हूँ जिसकी पीठ पर कूबड़ उभरा हुआ हो, सोचता हूँ ऐसी कौन सी अदृश्य वस्तु है जिसका भार संभालते हुए यह व्यक्ति इतना झुक गया है। नम्रता में झुका हुआ आदमी सन्तोष देता है पर मजबूरी में झुका हुआ आदमी सवाल पैदा करता है। आखिर कौन है जिसने उस व्यक्ति को इतना झुका दिया है, क्या उसे कोई सज़ा दी गयी है जिसमें वो एक उम्र से ऐसे ही झुका हुआ है ?

कभी लगता है ये सब वो लोग हैं जो व्यवस्थाओं के सीधे ढाँचे में क़ैद नहीं हुए और अलग से सुरंग खोदकर तिरछे रास्ते बनाते हुए इनकी पीठ पर मिट्टी का एक ढेर जम गया है।

हंचबैक ऑफ नोट्रे डेम फ़िल्म का एक दृश्य

कहीं कोई कहता है कि व्यक्ति के बुरे कर्म अगले जन्म में कूबड़ बनकर उसके साथ जन्म लेते हैं। ख़ैर हमारे तय किये हुए ख़ूबसूरती के पैमाने पर जो भी फ़िट नहीं बैठता हम उसे सिर्फ़ बदसूरत ही नहीं कहते बल्कि बदसूरत होने के तमाम ऐसे कारण खोज लाते हैं जो सामने वाले को कचोटते हुए हमें आत्मिक सुख देते हैं। हम उनकी तरफ देखना भी नहीं चाहते, देख भी लें तो उनसे टकराने का डर बना रहता है।

पर जब भी किसी कूबड़ वाले व्यक्ति को देखता हूँ तो सोचता हूँ कि इससे मिलते जुलते किसी व्यक्ति से तो कैसे न कैसे टकराया हूँ, पीठ पर टिका हुआ ऐसा बोझ पहले भी कई बार देखा हुआ है। तब एक नाम याद आता है, एटलस

ग्रीक मायथोलॉजी में एक देवता है एटलस, ताकत का देवता, जिसे ज़्यूस ने सज़ा देने के लिए उसके कंधों पर आसमान और स्वर्ग को बाँध दिया था। वह अगर उन्हें कंधे से फ़ेंकने की कोशिश करेगा तो वे उसे कुचल देंगे, इसलिए मजबूरी में कंधों पर उन्हें उठाये हुए वह कब से वैसे ही झुका हुआ खड़ा है।

“मैं जब भी देखता हूँ किसी ऐसे व्यक्ति को
जिसकी गर्दन उसके शरीर की ऊँचाई कम करने की ज़िद में
आगे की ओर झुक कर अकड़ गयी हो
और जिसकी पीठ पर समस्त आकाश का भार
कूबड़ बनकर उभर आया हो
तब सोचने लगता हूँ कि
इन सारे कूबड़ वाले लोगों को मैंने अवश्य ही पहले कहीं देखा है
पर कहाँ यह याद नहीं आता
देखते देखते उनके कूबड़ का आकार बढ़ने लगता है
जिसके विरुद्ध वो अपने पैरों से पूरा ज़ोर लगाकर
धरती में धँसने लगते हैं
और कुछ समय पश्चात वहीं पाषाणनुमा हो जाते हैं
फिर कुछ लोगों की भीड़ उन्हें घेर लेती है
और खींचने लगती है तस्वीरें
कई मूर्तिकार उन्हें अचरज से देखने लगते हैं
कई गणितज्ञ करने लगते हैं उन पर रखे भार की गणना
कई खगोलशास्त्री आकाश को बढ़ते हुए देख
चिंतित हो उठते हैं
पर मेरे दिमाग़ में वही सवाल हलचल करता रहता है
कि इस कूबड़ वाले व्यक्ति को पहले कहाँ देखा है
और तब अचानक एक नाम याद आता है
ओह शापित एटलस !”

तब लगता है कि कितने सारे एटलस हैं जो कोई सज़ा काटते हुए कितने ही सालों से ऐसे ही झुके हुए खड़े हैं। क्या एक बार में कुचले जाने से बेहतर है सदियों झुककर आसमान और स्वर्ग का बोझ साधे रहना। शायद एटलस जानता है कि उसके जीवन से ज़्यादा ज़रूरी है आसमान और स्वर्ग को सम्भाले रखना इसलिए इतने बोझ को कंधे पर उठाये वो उफ़्फ़ तक नहीं करता।

पर क्या हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम ऐसे जितने भी एटलस हैं उनके कंधे से यह भार उतार लें, उतार भी न पायें तो साथ में हाथ लगा दें, हाथ भी न लगा पायें तो कम से कम घृणा से देखना तो छोड़ दें।

प्रेम करिए प्रेम क्योंकि प्रेम से बड़ी तो कोई औषधि भी नहीं हुई। श्रीकृष्ण ने भी तो प्रेम से कुबड़ी औरत के सारे दुःख हर लिये थे।


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6 thoughts on “ओह शापित एटलस !

  • September 2, 2020 at 10:33 am
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    Behad zruri cheez likhi h yaar ❤️
    Shukriya isey logon tk pauchane k liye. Isey sabka padhna aur mehsoos Krna behad zaroori h❤️

    Reply
  • September 29, 2020 at 11:47 pm
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