” मंटो : एक पागल अफसानानिगार “

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अपने बच्चे को बड़ा होते देख वालिद बैरिस्टर ग़ुलाम हसन और वालिदा सरदार बेग़म बस इस बात से ख़ुश थे की ये नाकारा उनकी इकलौती उम्मीद नहीं है, इसके अलावा उनकी और भी औलादें हैं जिनके सहारे वो अपना बुढ़ापा बिता सकते हैं। और यही इकलौती चिंता भी थी की ये अपने मुस्तकबिल के साथ करेगा क्या और हो भी क्यों ना, जो लड़का दसवीं की परीक्षा में लगातार तीन साल फेल हो और 1931 में कहीं जाकर अपने चौथे प्रयास में पास हो सके उससे उसके वालिदैन और उम्मीद भी क्या करेंगे!

पीठ पीछे उसे उसके दोस्त टॉमी-टॉमी कहकर इस तरह उसके व्यक्तित्व का मख़ौल बनाते थे की हँसने की वो भारी आवाज़ें उसके कानों में आकर पड़ती थीं।

जब उसने लिखना शुरू किया तो जितनी बेअदबी ज़माने में उसकी लेखनी की हुई शायद किसी के साथ हुई हो। वो ख़ुद कहता था कि “मेरा कलम उठाना एक बहुत बड़ी घटना थी जिससे ‘शिष्ट’ लेखकों को भी दुख हुआ और ‘शिष्ट’ पाठकों को भी। लोगों ने उसे दुत्कारा, कई दफ़ा कटघरे में खड़ा किया, यहाँ तक की समाज ने उसे साहित्यकार मानने से भी इंकार कर दिया था। दफ़ा 292 के तहत अश्लीलता फैलाने के और युवाओं को ख़राब करने के आरोप में उसके ऊपर बारी-बारी से 6 मुकदमे चलाए गए!

एक पिता और पति के रूप में भी उसने बहुत मेहनत की मगर ये उसकी लेखनी थी जो पिता और पति दोनों पर हमेशा हावी रही।

एक बार अपनी पत्नी सफ़िया को उसने कहा की “तुम चिंता मत करो मैं ख़ूब लिखूँगा ताकि तुम्हें कभी भूखा ना रहना पड़े”
सफ़िया ने कहा “ये आपका लेखन ही है जो हमें भूखा मारेगा।”

कहते हैं नींद से बड़ा कोई नशा नहीं लेकिन नींद के रास्ते में भूख पड़ती है। भूख चाहे जिस्म की हो या रोटी की लेकिन इस भूख को मिटाने के लिए रोटी पर ही जिस्मानी मशक्कत होते देख उसकी कलम पागल हो गई थी!

42 साल की ना’क़ाबिले-बर्दाश्त ज़िंदगी जी कर अपनी पाँच, सात और नौ साल की बेटियों को ख़ुद’से हद्द’ओ-हद्द मोहब्बत वाली सफ़िया के भरोसे छोड़ वो इंतकाल फ़रमा गए।

ये घटनाएँ उस इंसान को सदी के सबसे महान अफसाना निगार बनने के कुछ पड़ाव थे, जिन्हें वो अपनी कलम की ही तरह बिना रोके पार चला गया। ये कहानी उस इंसान की है जिसका लिखा पढ़ना या सुनना आपको मानसिक तौर पर पागल कर सकता है यदि आप समाज के नंगेपन से अनिभिज्ञ हैं तो!
“सआदत हसन “मंटो” जैसा अफसाना निगार न था, न है, न होगा!


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Anuj Tiwari

• मोमिन ने कहा : "मैं वही हूँ मोमिन ए मुब्तिला" मैं 'मुब्तिला' हूँ और था, मैं वही देव हूँ जिसके लिये कहा गया है "निर्विघ्नं कुरू मे देव: सर्वकार्येषु सर्वदा" मैं वहीं था जब द्रोपदी के आंचल का पहला कोना दुशासन ने थामा था, मैं 'असद-ए-ख़स्ता जां" के "ख़स्ता" में हूँ, मैं ऊधौ के पैरों की धूल में था, मैं शिव के अमृत मंथन में ख़लल डालने वाला, मैनें विश्वकर्मा के छैनी हथौड़े चांडे, मैं बुद्ध के महापरिनिर्वाण का साक्षी, मैं वर्द्धमान का जिन, मैनें ब्रह्मा को एकाकार होते हुए देखा था, मैं शाहजहां के ताजमहल का मज़दूर जिसकी बांहे सलामत हैं, अर्जुन के गांडीव को बनाया मैनें, मैं तितलियों का मुसव्विर ! •

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