लैंग्वेज और हम (थ्रू लेंस ऑफ झुम्पा लाहिरी)

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लैंग्वेज और हम- (थ्रू लेंस ऑफ झुम्पा लाहिरी)

झुम्पा लाहिरी – एक बंगाली माता-पिता की पुत्री जो न्यू यॉर्क शहर में पैदा हुई,

 

Pulitzer Prize-winner Jhumpa Lahiri is the author of The Namesake and Interpreter of Maladies.

 

यह समय प्रवासियों का समय है. हम सब एक कांस्टेंट प्रवास में विचरण कर रहे हैं. एक वक़्त जो चीज हमारे सबसे करीब होती है वह अगले वक़्त छूट सी जाती है.

यह समय इतिहास में सबसे निकटता का समय है. सारी दुनिया, कदमों से नापी जा सकती है. पर अपनापन अब नदारद है. हम इस इंटरकनेक्टेड वर्ल्ड में तैर रहे हैं, और हमारे नीचे का फोम गायब है. ऐसे में हमारा लैंग्वेज क्या वह फोम है जिससे हम सबसे क्लोज हैं?

एक हिंदी बोलने वाला यदि कई वर्षों से अंग्रेजी प्रदेश में प्रवास कर रहा हो तो वह किस भाषा से जुड़ा रहेगा? क्या वह हिंदी में ही अपने तरलता को मोल्ड कर पायेगा या फिर भाषा बस एक साधन है, और हम किसी भी भाषा से अपने गन्तव्य तक पहुँच सकते हैं?

 

झुम्पा लाहिरी – एक बंगाली माता-पिता की पुत्री जो न्यू यॉर्क शहर में पैदा हुई, जिसने अंग्रेजी में किताब लिखा और पुलित्ज़र प्राइज जैसा खिताब जीता – वह सबकुछ छोड़कर इटालियन सीखने लगी और उसी लैंग्वेज में अपनी साहित्य रचना करने लगी. यह एक क्यूरियस केस है. इसका विश्लेषण, झुम्पा ने अपने मेमॉयर *इन अदर वर्ड्स* में किया है. 

वह जब अंग्रेजी छोड़ रहीं थीं तो सिर्फ भाषा नहीं बदल रहीं थीं पर एक जिंदगी पीछे छोड़ रहीं थीं. जैसे मुराकामी कहते हैं, जो तूफान में अंदर जाता है और जो बाहर आता है, वह एक नहीं होता – ठीक उसी तरह एक भाषा को अपने भीतर खत्म कर के दूसरे को जन्म देना, आपको भी पुनः जीवित कर देता है.

 

हम प्रवास क्यों करते हैं? क्योंकि हमें अपने जीवन से अलग उम्मीदें होती हैं. क्योंकि हम खुद को एक सीमा में बंधे हुए नहीं पाना चाहते हैं. क्योंकि हम प्रवास कर सकते हैं. ऐसे में, हमारे भीतर का सबकुछ ट्रांसपोर्ट हो जाये ऐसा नहीं है. हमारा शरीर एक जगह से दूसरे जगह भले टेक्नोलॉजी के थ्रू दौड़ जाये पर हमारा मेटाफिजिक्स इस टेक्नोलॉजी को नकार देता है. हमारी भाषा अपने भीतर हमें कैद कर लेती है. झुम्पा लाहिरी की यात्रा उस कैद को छुड़ाना ही है.

 

लाहिरी प्रवासी ही रही हैं. उनका नेटिव प्लेस यह समाज नहीं बता पाया. वह खुद अपने को नेटिव नहीं बना पाई. इस नेटिविटी की गैर-मौजूदगी ने उन्हें अपने लिए एक आइलैंड बनाने का ख़्वाब सजाया. उनके भीतर कुछ काट रहा होगा, जिसे वह छोड़ना चाहती होंगी. वह कटान, बाहरी परिवेश की नजरों से बचा हुआ है.

 

झुम्पा का मेमॉयर इस यात्रा को बखूबी बयाँ करता है. वह जो हमेशा से अपनेपन की फील से उजड़ी रही हैं, उन्होनें खुद के लिए एक अपनापन खोज निकाला. आखिर में हमारा जीवन और कुछ नहीं एक अपनेपन की आकांक्षा में किया गया प्रयोग भर है. कुछ फेल होते हैं, कुछ करते ही नहीं हैं.

 भाषा बदलने के समय के स्टेट ऑफ माइंड को झुम्पा लिखती हैं, “जो एंग्जायटी वह फील कर रहीं थीं या फिर अभी भी फील करती हैं वह निकटता के अपूर्णता की निराशा के वजह से है.”

 

हम आखिर इस दुनिया में किससे सबसे करीब हैं? कोई इंसान तो शायद ही आये, पर वह भाषा जिसमें हम आकवार्ड फील करें पर सबकुछ आँखें मूंद कर बयाँ कर दें तो वह हमारा सबसे करीबी है. यह झुम्पा का एक्सपीरियंस है. हमें उनके अनुभव को समझना चाहिए. सवाल नहीं करना चाहिए.

 

जैसा विट्टगेन्सटाइन ने कहा है, *जहाँ हम कुछ बोल नहीं सकते, वहाँ हमें चुप रहना चाहिए*.

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अविनाश मिश्रा (thedhibri)


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