लेखकों के लेखक – कृष्ण बलदेव वैद

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‘इलहाम के लिए इबादत ज़रूरी है’

-कृष्ण बलदेव वैद 

 

 

आज हम बात करेंगे अपने आइकॉनिक नैरेटिव स्टाइल में लिखने वाले, साहित्य की रूढ़ियों के खिलाफ अपने किरदार गढ़ने वाले, हिंदी साहित्य के लेखक कृष्ण बलदेव वैद की । जिनका जन्म 27 जुलाई 1927 को पाकिस्तान में हुआ। वो पार्टीशन के बाद भारत आए।  ये बात इसलिए भी  क्यूंकि उनकी लेखनी में एक बंजारापन या यूं कहूं, एक घर की तलाश दिखाई देती है।

 

कृष्ण बलदेव वैद एक ऐसा लेखक जिसने सिर्फ अपने लिखे को सत्य माना । जिसने पाठकों को नहीं माना । जिसने आलोचकों की परवाह किए बिना अपनी प्रयोगात्मक लेखनी को जारी रखा । यही कारण रहा कि हिंदी साहित्य को अपनाने वाला ये लेखक, अपनी भाषा के लोगों के द्वारा अस्वीकृत किया गया। अपनी लेखनी में यथार्थ परक भावों को गंभीरता से लाने वाले इस लेखक ने जिस नजर से समाज को समाज के सामने रखा है उसे  हम सब देख तो रहे थे, मगर उसे इग्नोर करते जा रहे थे।

लेखनी और प्रवास

उनकी लेखनी में एक स्थाई ठहराव कि खोज दिखाई देती है। एक ऐसा घर जहां लेखक अपने किरदारों को पहुंचाना चाहता है। इसका कारण पार्टीशन तो था ही मगर उसके बाद उनका  अमेरिका  प्रवास भी था ।

दिल्ली में अपनी पढ़ाई पूरी करके वे अमेरिका चले गए ।  जिस दौर में हिंदी के बौद्धिक लेखक अमेरिका की निंदा और  यूरोप की प्रशंसा किए नहीं थकते थे , उस समय बलदेव वैद ने प्रवास के लिए अमेरिका को चुना । अपने निर्णय के पक्ष में वे बताते  हुए  कहते हैं कि 

“ऐसा नहीं है की अच्छा साहित्य अमेरिका में नहीं लिखा जाता, अगर ऐसा होता तो विश्व साहित्य को कभी हेमिंग्वे जैसा राइटर नहीं मिलता ।”

 

मै अपनी बात के प्रमाण में आपको बताऊं कि , इतने बड़े लेखक को कभी भी कोई पुरस्कार नहीं मिला। कारण एक दफा जब साहित्य अकादमी ने इनका नाम नामित किया था, तो शीला दीक्षित की सरकार  के एक कांग्रेस नेता के कहने पर, साहित्य अकादमी को  पुरस्कार विजेता के बारे में फिर से सोचने को कहा गया । क्योंकि उन महाशय को बलदेव वैद की लेखनी बेहूदा लगी। इस बात से दुखी हो कर वैद ने अपना नाम वापस ले लिया ।

 

वैरागी पन

बलदेव वैद, निर्मल वर्मा और कृष्ण सोबती जैसे नए और बदलाव वाले लेखकों के दौर के लेखक थे। इन तीन लोगों के लेखन ने, हिंदी साहित्य को 70 वर्षों तक प्रभावित किया है किया। ये कहा जाता है कि कृष्णा सोबती लोगों के बीच, अपनी बोली के लिए, निर्मल वर्मा अपने मौन के लिए और बलदेव वैद अपने वैरागी पन के लिए जाने जाते थे। और सच कितना है इसके लिए आपको इन तीनों को पढ़ना होगा ।

खैर दुनिया ने कब किसी वैरागी की बात उसके जीते जी सुनी है।  

 

10 उपन्यास , 16 कहनी संग्रह , 6 डायरी, 7 नाटक, और जाने कितना अनुवाद, आप सोचिए कि कितना कुछ था इनके पास कहने के लिए।  उनका प्रयोगवादी लेखन ही था कि उन्होंने शरुआती तीन उपन्यासों के बाद “काला कोलाज” जैसा नॉवेल लिखा।

 जो  हिंदी फिक्शन की कई सारी रूढ़ियों और बेड़ियों को तोड़ते हुए आगे निकल गई । यही कारण था कि उनकी इस किताब को एंटी नॉवेल तक कहा गया। क्यूंकि उस वक्त तक हिंदी में ऐसे उपन्यास नहीं लिखे जाते थे।

 बलदेव वैद लेखकों के लेखक

वैद के बारे में ये भी कहा जाता है कि 

कुछ लेखकों को बहुत  से पाठक फॉलो करतें हैं, लेकिन कुछ लेखकों  को  लेखक फॉलो करते हैं और बलदेव वैद लेखकों के लेखक है ।अगर आप हिंदी लेखन में है तो बलदेव वैद आप के लेखक हैं।

 

अपने एक इंटरव्यू में  बलदेव वैद कहते हैं कि

 

“साहित्य में डलनेस को बहुत महत्व दिया जाता है. भारी-भरकम और गंभीरता को महत्व दिया जाता है. आलम यह है कि भीगी-भीगी तान और भिंची-भिंची सी मुस्कान पसंद की जाती है. और यह भी कि हिन्दी में अब भी शिल्प को शक की निगाह से देखा जाता है

 

बिमल उर्फ जाएँ तो जाएँ कहाँ’ को अश्लील कहकर खारिज किया गया. मुझ पर विदेशी लेखकों की नकल का आरोप लगाया गया, लेकिन मैं अपनी अवहेलना या किसी बहसबाजी में नहीं पड़ा. अब मैं 82 का हो गया हूं और बतौर लेखक मैं मानता हूं कि मेरा कोई नुकसान नहीं कर सका. जैसा लिखना चाहता, वैसा लिखा. जैसे प्रयोग करना चाहे किए.’

 

एब्‍स्‍ट्रैक्‍ट होते हुए भी वि‍जुअल्‍ज में सबसे ज्‍यादा दिखाई देने वाला मॉडर्न प्रोज लिखने वाले बलदेव वैद को पढ़ा जाना चाहिए । क्यूंकि हिंदी साहित्य में नए प्रयोगों वाले लेखक बहुत काम हुए हैं। 

 


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