कोफ़्त

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दूर कहीं एक ख़ूबसूरत बग़ीचा है जिसमें एक शहतूत के पेड़ के नीचे हम दोनों लेटे हुए हैं, तुम अपने चश्मे को दूरबीन बनाकर आसमान की निगरानी में लगी हुई हो और मैं देख रहा हूँ तुम्हारे माथे के बीचों-बीच टप्प से गिरते हुए रंग बिरंगे शहतूत जो तुम्हारे माथे पर बिंदी बनकर जम जाते हैं। जिस रंग की बिंदी तुम चाहो उस पेड़ से उसी रंग के शहतूत गिरते हैं ।

तुम्हें देखते रहना हमेशा से मेरे लिए एक सम्मोहन की तरह है, जिसमें ज़िद है सब कुछ छोड़कर बस तुम्हें ही देखते जाने की, अपलक।

तुम आसमान को देखते हुए अचानक बेचैन हो उठती हो मानो अनेक खूँखार बाज़ों को हमारी तरफ आते देख लिया हो। मेरा हाथ कसके पकड़ती हो और ज़ोर ज़ोर से कुछ बड़बड़ाने लगती हो , जैसे किसी सम्मोहन को मिटाने के लिए कोई मन्त्र पढ़ रही हो। मेरी नींद टूट जाती है।

हम जब भी इस दुनिया के शोर से दूर किसी बग़ीचे में जाकर बैठने की बात करते थे, हमेशा किसी न किसी वजह से वो बात अधूरी रह जाती थी, ऐसे ही ये सपना जब भी आता है अधूरा ही रह जाता है।

कितनी कोफ़्त होती है न, जब हम किसी सपने के अधूरेपन में ही नींद से जाग जाते हैं, कोशिश करते हैं कि ये किसी सीडी प्लेयर की तरह हो जिसमें हम फ़िल्म वहीं से रिज्यूम कर सकें पर वो सपना गायब हो जाता है।

मैं कोशिश करता हूँ वो सपना वहीं से रिज्यूम करने की और फिर सो जाता हूँ। फिर उसी बग़ीचे में पहुँच जाता हूँ, उस शहतूत के पेड़ के नीचे पर इस बार मैं वहाँ अकेला होता हूँ, तुम दूर दूर तक कहीं नहीं दिखती। रंग बिरंगे शहतूत जो तुम्हारी बिंदी बनाते थे, काले पड़कर अब एक पत्थर पर गिरके धब्बे बनाते हैं।

उन धब्बों से उस पत्थर पर तुम्हारा नाम उभर आता है और नीचे उभर आती है एक तारीख। उस पत्थर पर सर टेके हुए मैं देखने लगता हूँ आसमान की तरफ और तुम्हारा चश्मा मेरी आँखों पे पड़ जाता है। अब मैं निगरानी करता हुआ आसमान में तुम्हें ढूँढने लगता हूँ, सपना ख़त्म हो जाता है और नींद पूरी।

इन दोनों सपनों के बीच मुझे हमेशा चुभता है नींद से जाग जाना, मुझे मालूम नहीं चल पा रहा कि तुम अचानक कैसे और कहाँ गायब हो गई और तुम क्या बड़बड़ा रही थी।

क्या होता अगर मेरा सम्मोहन नहीं टूटता, मैं नींद से नहीं जागता, क्या तब तुम वहाँ होती ? क्या मैं वहाँ होता तुम्हें जाने से रोकने के लिये? क्या ऐसा मुमकिन नहीं कि मैं अगली रात सपने के किसी और मोड़ पर नींद से जागूँ, देख पाऊँ तुम्हारा जाना और तुम्हें रोक पाऊँ ?

 


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