मीम के पुल पर कंगना और शिवसेना

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यदि जिंदगी सिनेमा है तो, अपन को एक हीरो और एक विलेन चाहिए. पर जिंदगी सिनेमा से तो बहुत दूर की चीज़ है. यहाँ ना ही कोई हीरो और ना ही कोई विलेन. पर ससुरा सिनेमाई दिल की किसी न किसी को हीरो बनाना है, और किसी न किसी को विलेन.

 

भगवान राम कलियुग में

सारी बुद्धिमत्ता अब इसी चीज़ में खर्च होती है कि किसका हीरो बेहतर है. यह इस युग का सबसे बड़ा युद्ध है. राम भी शायद इस युग में परशुराम वाले गैंग के ऊपर मीम बना रहे होते, तंज कस रहे होते और बानर सेना धड़ल्ले से शेयर कर कर रही होती, जिससे जाने कौन सा पुल बनेगा राम ही जाने .

पर न तो राम हैं, न परशुराम. हम बेचारे अकेले फंसे हैं, मीम है, इंसेंसिटीवीटी है और बेरोजगारी है. अब इसी सर्कल में घूम रहे हम लोग.

 

वीमेन इम्पॉरमेंट का छौंका

बात करनी है अभी कंगना रनौत की. पेशे से अभिनेत्री हैं और काम से हीरोइन. जीवन उनका रंगमंच है जिसमें जबर का भगवा डला हुआ है. मानो राजनीति की कराही में एक वीमेन इम्पॉरमेंट का छौंका मारा गया है.

दूसरा जत्था है सकुनी टाइप लोगों का. रंग वही है, थोड़ा और गाढ़ा, थोड़ी फिसलन ज्यादा है. पेशे से सरकार है और काम से बदला: द रिवेंज. इनके मुखपत्र पर एक ढही हुई इमारत की ऑटोप्सी रिपोर्ट है.

इन दो जत्थों की जंग में, मैं और मेरे जैसे हजार लोग, एंटरटेन हो रहे. मुझे लगता है, उन्नीस सितम्बर से पहले यह निपट ले फिर आईपीएल भी आ जायेगा तो वक़्त बाँटना मुश्किल हो जायेगा. साला, न चाह के भी एक छूट जाने का दुःख गहरा जायेगा. मिडिल क्लास आदमी को दुःख से बचना ही सिखाया जाता है. (सन्तोष करना ही दुःखों का निवारण है).

 

मृत्यु आपको कितना ताकतवर बना देती है.

अब देखिए न, मैं कहाँ भटक गया. बात राजनीतिक कड़ाही की चल रही थी और मैं आ गया मिडिल क्लास के इतिहास पर. खैर, देखें तो यही सही भी है, अब बात है राजनीति पर और खिंच आ रही है हिस्ट्री.

लड़ाई है ड्रग्स पर, गिर जा रही है बिल्डिंग. सुसाइड के भीतर से झाँक कर निकाला जा रहा है सबकुछ. कभी कभी सोचता हूँ, मृत्यु आपको कितना ताकतवर बना देती है. उसके भीतर से पूरी मिथ्या दुनिया का रसपान किया जा सकता है.

अब भाषा सुसज्जित करने जा रहा हूँ. हिंदी के नियम से बंध कर वाक्य रचूँगा. क्योंकि थोड़ी ढील छोड़ी तो एक एंकर की तरह ही मेरी भाषा सीधे हिट कर जायेगी. आपलोग सभ्य लोग बुरा मान जायेंगे. गांधी शायद हमको लठिया भी दें. तो मैं मौन हो जाता हूँ.

एक मीम आईडिया है, एक ढही हुई बिल्डिंग के राख से एक आत्मा निकलती हो जिसमें एक जाने चेहरे की झलक हो और उसके इंसाफ की आवाज़ सीधे न्यूज़रूम में सुनाई दे.

मीम अच्छा है या मीम सच है?

लेख- अविनाश मिश्रा

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