FTII की गोल्ड मेडलिस्ट-जया भादुरी!

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1971, FTII की एक लड़की पर ऋषिकेश मुकर्जी की नज़र पड़ी और वह जा पहुँचे प्रिंसिपल के दफ़्तर। वह लड़की पास आउट होने ही वाली थी, मगर उससे पहले उसके दामन में थी एक बड़े डायरेक्टर की फ़िल्म।

आप सोच रहे होंगे,कितनी कमाल की किस्मत होगी, इस लड़की की, तो आपको बता दूं, सिर्फ किस्मत नहीं थी, FTII की गोल्ड मेडलिस्ट भी थी यह लड़की।

15 साल की उम्र में सत्यजीत रे की फ़िल्म ” महानगर” में अभिनय कर चुकी यह लड़की, अपने पड़े-लिखे माँ बाप की बदौलत FTII में पढ़ने गयी और उसके बाद तो जैसे अभिनय उसकी जिंदगी और परिवार दोनों बन गया।

ऋषिकेश मुकर्जी को FTII से मिली उनकी “गुड्डी” और हम सबके सामने आयीं, सरक, परिपक्व अभिनय का, हिंदी सिनेमा से संगम कराती, जया भादुरी।एक अभिनेत्री जो अपनी पहली ही फ़िल्म से एक मंझे हुए कलाकार के रूप में स्थापित हुई।

उस समय जब अदाकारा के अभिनय को देखने वाली ऑडियंस बनी ही नहीं थी, एक अभिनेत्री, जिसने अपनी सादे भावों से कला का एक नया रूप हिंदी सिनेमा से सामने रखा, वह थी जया भादुरी।

जया भादुरी का जन्म भोपाल में हुआ.उनके पिता एक लेखक और पत्रकार थे, अपने एक इंटरव्यू में वह कहती हैं,
” मैं एक प्रवासी बंगाली परिवार में पली बढ़ी हूँ, जहाँ मेरा बचपन आम बच्चों सा गुजरा, मैं बहुत नार्मल परिवार में जन्मी, जहाँ सभी लोग ओपन-माइंडेड थे, मुझे कभी कोई काम करने से रोका नहीं गया, बल्कि मुझसे यह कहा जाता था, कि तुम जो भी करना चाहती हो, उस पर भरोसा करो, और कॉन्फिडेंस से उसे करो”

उस समय एक लड़की के लिए यह परिवार कितना सुखद होगा, वैसे आज भी बहुत सी हिंदुस्तानी लड़कियों के लिए ऐसा परिवार एक स्वप्न ही है। हाँ अब आप कह सकते हैं कि यह लड़की थी तो किस्मत वाली।

1971 के बाद जया भादुरी की अभिनय यात्रा को जो पंख लगे है ,उनमें कोरा कागज ,उपहार, कोशिश कुछ बेहद जरूरी और पहले पड़ाव हैं, एक ताज़ा अभिनय देखने को मिलता है उनकी इन फिल्मों में। कहते हैं कला का पूर्ण रूप उसकी सरलता है और शायद यह अभिनेत्री इस पूर्णता की कोशिश में ही अभिनय करती है।

1973 में आई “अभिमान”, “जंजीर”, 1975 की फ़िल्म “मिली” और न जाने कितनी की कमाल की फिल्मों में अपने हर किरदार के साथ न्याय कर जया भादुरी ने हर बार अभिनय की मिठास को अपनी अदाकारी में जिंदा रखा।

1981 में आई फ़िल्म सिलसिला में बाद जया भादुरी फिल्मों में लंबे समय तक नहीं दिखाई दी। सोचिए उस समय उनके अभिनय ने उनसे कितने अनगिनत सवाल किए होंगे, और वह औरत, बस एक माँ सी रही,अपनी अभिनय की सरलता को एक माँ ने अपने जीवन में कितना बखूबी धारण किया होगा।” तुम जो भी करना चाहती हो, उस पर भरोसा करो, और कॉन्फिडेंस से उसे करो” यह वाक्य शायद उनकी ज़िंदगी का मूल मंत्र रहा होगा। परिवार के लिए फिर से एक ओपन-माइंडेड पिता की पुत्री ने बिल्कुल सहजता से एक निर्णय लिया ,जो अभी शायद हमारी समझ के परे है।

सत्रा साल के लंबे अंतराल के बाद वह हिंदी सिनेमा में वापस आयी,”हज़ार चौरासी की माँ” था फ़िल्म का नाम। यह वह समय था जब अमिताभ बच्चन की कंपनी अपने पतन पर थी। मगर जो भी कारण रहा हो ,जया भादुरी ने 1998 से फिर अभिनय को गले लगाया। इस बार उनके अभिनय में जीवन की वह पड़ाव दिखा जिसे वह जी रही थी, लेकिन इस नए किरदार में भी पुराना सरल परिपत्व अभिनय पूर्णतः जीवित था।

FTII की गोल्ड मेडलिस्ट जया भादुरी इसके बाद कुछ कुछ अंतराल में हम सब को अपनी प्रतिभा से छूती रही। मगर हर बार,आज भी,जब उनको फिल्मों में देखते हैं, न जाने क्यों एक मलाल सा रह जाता है, मन कहता है,काश! उन्होंने भी अमिताभ बच्चन, जितने समय तक,अभिनय किया होता। काश! वह भी अभी तक अपनी सहज प्रतिभा को हम तक साझा कर रही होती।

 लेकिन फिर ध्यान आता है हर आम हिंदुस्तानी महिला का और सब कुछ रुक जाता है, वहीं ,1971 की “गुड्डी” में, 1975 की ” मिली” में।


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