इस्मत चुग़ताई की 5 Under-rated रचनाएँ

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इस्मत चुग़ताई जिन्होंने अपने बेनियाज़ व्यक्तित्व से महिलाओं के सवालों को उठाया और अपनी बेबाक कलम से जवान होती लड़कियों की मुश्किलों , चाहतों और सपनों को दुनिया के आगे रखा। महिलाएं इस्मत चुग़ताई को अपने मर्म से जोड़ते हुए बड़े लुत्फ़ के साथ पढ़ सकती हैं पर मर्दों के लिए इस्मत आपा को पढ़ना बड़ी हिम्मत का काम है क्यूंकि उसने आज तक औरत को या तो शरीर की ज़रुरत पूरी करने का सामान समझा या फिर कोई देवी या पैग़म्बर माना और इस्मत आपा को पढ़ कर जब उसे मालूम होता है की औरत उतनी ही इंसान है जितना की वो, तो ये बात पढ़कर मर्द बौखला जाता है। मर्द की आँखों पर समाज ने ऐसी पट्टी बांध दी की उसे नज़र ही नहीं आया की औरत के पास भी दो आँखे एक नाक दो कान दो हाथ दो पैर एक दिल और उसी के बराबर चलने वाला एक दिमाग़ भी है और अब ये बात उसे बड़ी नाग़वार गुज़रती है।

 

1- थोड़ी सी पागल

ये कहानी एक प्यारी बच्ची जो बड़ी होकर एक प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लड़की बनती है। अपने सपने भूल कर वॉर मे शहीद हुए अपने भाई का पायलेट बनने का सपना और अपनी बहन के बैले डांसर बनने का सपना खुद पूरा करती है। अपनी बेशर्म और बेचैन तबियत के चैन के लिए खुद के बचपन के डॉक्टर बनने का सपना भी पूरा करती है और एक दिन अपने एक मरीज़ नाज़िम हिकमत जो एक बड़े कवि और नॉवेलिस्ट थे के प्रेम मे पड़ जाती है । जो होश मे है वो प्रेम मे नहीं है प्रेम तो बेहोशी मे होता है और इसी बेहोशी में गलीना ने नाज़िम हिकमत का घर सजाया उनके बेटे और पत्नी की तसवीरें लगायीं और ता उम्र बिना किसी शर्त और बिना किसी वादे के प्रेम किया।
“आवश्यकता से अधिक भावुक लोग, थोड़े से पागल होते हैँ

2- दोज़ख़ी

अज़ीम बेग़ चुग़ताई (इस्मत आपा के बड़े भाई ) पर लिखा उनका मज़मून। इस्मत आपा ने सिर्फ औरतों की आज़ादी के लिए काम किया ये कहना गलत होगा क्यूंकि असल मे तो ये लेख लिख कर उन्होंने मर्द को मर्द होने से आजादी दिलवा दी। अपने भाई के बारे मे वो लिखती हैँ की वो अपनी नॉवेल के हीरो जैसे कतई नहीं थे बल्कि वो तो एकदम कमज़ोर और नाज़ुक थे। वो इंसान थे उन्हें बीमार होने का, लाचार होने का हक़ था।
मंटो की बहन ने उनसे कहा की “हाय ये इस्मत तो अपने भाई को भी नहीं बख़्शेगी” मंटो ने तुरंत उत्तर दिया की “मेरे बारे मे कोई इतनी सच्चाई से लिखे तो अभी इसी पल मर जाऊँ”


इस्मत और मंटो का यही अनोखा रिश्ता था जिसपर मंटो ने कहा “की अगर मै औरत होता तो इस्मत होता और अगर इस्मत मर्द होती तो मंटो होती”

3- घरवाली

मिर्ज़ा एक सेठ और उसकी नई नौकरानी लाजो की कहानी। लाजो एक चुलबुली लड़की और मिर्ज़ा एक सख्त मिजाज़ सेठ के बीच कैसे सम्बन्ध बदलते हैँ और कैसे मिर्ज़ा की लाख कोशिशों के बाद भी वो लाजो को अपने ज़हन मे बनाए एक शरीफ़ घरवाली के ढांचे मे नहीं ढाल पता। मिट्टी को जितना ज़ोर से पकड़ा जाए उतनी जल्दी हाथों से फिसलती है।

4- मासूमा

इस्मत चुग़ताई के द्वारा लिखा गया उपन्यास। मासूमा की कहानी जो अपनी माँ के रहन सहन के ढंग को बरकरार रखने के लिए देह व्यापार मे इस कदर फस्ती है की बाहर निकलना नामुमकिन हो जाता है। मासूमा अपनी बेटी को जब एक दिन खिड़की के बाहर खेलता देखती है तो सोचती है की “काश मै तुझे इस दुनिया से बचा सकती काश मै तुझे अपनी कोख मे ही रख लेती”।

5- औरत

इस्मत आपा का मज़मून। ये एक फेमिनिस्ट लेख है पर किसी भी सिद्धांत, आलोचना या राय से कई ज़्यादा रोचक है। वो कहती हैँ की औरतों को बार बार ये याद दिलाया जाता है की उन्हें बच्चे जनने है। पति के मर जाने पर चूड़ियां सिन्दूर और हर रंग उस से छीन लिया जाता है जबकी किसी आदमी की पत्नी के मरने पर उसे ऐसा नहीं करना पड़ता वो तो उसी सूट-बूट शेरवानी मे घूमता है “दिखावे के लिए भी सोग नहीं मनाता”। औरतों पर लांछन लगाए जाते हैं की एक बेवफ़ा औरत एक बेवफ़ा मर्द से ज़्यादा खतरनाक होती है ये तो वही बात हुई की एक काली औरत एक काले मर्द से ज़्यादा काली होती है जो को न तो मानने योग्य है और न ही मुमकिन। कार्यस्थल पर समानता कैसे आएगी और शोषण से कैसे बचना है इसके भी तरीके बताए गए हैँ।

इस्मत चुग़ताई ने उस समय जेंडर फ्लुइडिटी की बात की जब इंसान इसे गुनाह मानता था। उस समय साहित्य मे अपनी जगह बनाई जब औरतों को पढ़ने लिखने तो दूर घूंघट से बाहर झाँकने की भी इजाज़त नहीं थी। इस्मत आपा ने ही बताया की मर्दों को हर वक्त अपनी छाती पर मर्दानगी का ठप्पा लगाकर अपने एहसासों को दफ़नाने की ज़रुरत नहीं हैं, औरतों को हर वक्त सहनशीलता और दरिया दिली का चोला ओढ़ना ज़रूरी नहीं है।

 


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