भारतीय सिनेमा और अस्तित्ववाद!!!

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“सिनेमा समाज का प्रतिबिम्ब है”, न कहकर अगर हम यह कहें कि ” सिनेमा मनुष्य का प्रतिबिम्ब है”, तो शायद कुछ गलत नहीं होगा क्योंकि समाज के जकड़ी सभ्यताओं से पहले देखे गए हैं,विचरते मनुष्य।

1896 में लुमियरे बंधु अपना फ़िल्म शो लेकर मुम्बई आए, और सवे दादा ने उनसे प्रभावित होकर हिंदुस्तान की पहली शार्ट फ़िल्म या यूं कहें एक शार्ट डॉक्यूमेंट्री बनाई, नाम था “the wrestler”, जिसमें बम्बई में हुई कुश्ती को कैमरे में फिल्माया गया। उसके बाद उन्हानें और भी बहुत ही डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाई,जो सभी उस समय पर हुई घटनाओं पर आधारित थी ।

(सवे दादा)

उनके बाद दादा साहब फाल्के ने 1913 में पहली फुल लेंथ फ़िल्म बनाई जो पौराणिक कथाओं की पृष्ठभूमि पर बनाई गई, दादा साहब का ज्यादातर सिनेमा, पौराणिक या इतिहासिक पन्नो से लिया गया था। इस तरह इस देश में सिनेमा आया और देश के हर बदलाव से साथ हिंदुस्तानी सिनेमा बदलता गया।

इसी बदलाव में जन्म हुआ अस्तित्ववाद का, यह हर उस दौर में आया जब मानवता ने अपना दम तोड़ा और हाँ कुछ इसी तरह यह,फिल्मों में भी आता रहा, हर बार सामाजिक फूहड़ता पर बनी हज़ारों फिल्मों के बाद यह सिनेमा जीवित होता।

यह एक ऐसा सिनेमा है, जहाँ मनुष्य के अस्तित्व की खोज पर एक पथिक सी चलती है पठकथा, जहां नायक रोटी कपड़ा मकान जैसी बुनियादी जरूरतों के साथ साथ अपने जीवन दर्शन के लिए भी लड़ता है और जहां मानवता के ढोंगी संवाद न होकर, खुद का अन्वेषण करता जीवन होता है।

एक सिनेमा जो समाज की कठपुतली न बनकर मनुष्य की सत्यता के साथ खड़ा रहा।

हिंदुस्तानी सिनेमा में इस अस्तित्ववाद की लो कितने ही दशकों से जल रही है, पूंजीवादी, उपभोगतावादी समाज के अनगिनत थपेड़ों के बाद भी यह सिनेमा आज भी जीवित है।

यह अलग बात है कि आज भी अस्तित्व की पुरज़ोर लड़ाई लड़ रहा है अस्तित्ववादी हिंदुस्तानी सिनेमा।

1950-60 में जहाँ हर दूसरी फ़िल्म उस समय की सामाजिक कुरीतियों पर बन रही थी, इसी दौर में 1957 में आई गुरु दत्त साहब की फ़िल्म “प्यासा” ,जिसमें कुछ मायनों में अस्तित्ववादी हिंदुस्तानी सिनेमा की झलक मिलती है। इस फ़िल्म का नायक एक कलाकार के रूप में अपना अस्तित्व ढूंढने की कोशिश कर रहा था और इसी के साथ दुनिया के पाखंडों से अपनी इसी कला के दम पर लड़ भी रहा था।गुरु दत्त निर्देशित कुछ और फिल्मों में भी इस तरह का सिनेमा दिखाई दिखाई दिया।

1965 में आई देव आनंद की फ़िल्म “गाइड” के कुछ दृश्य भी अस्तित्ववादी हिंदुस्तानी फ़िल्म का प्रतिनिदित्व करते हैं,जहाँ नायक जीवन के अलग अलग रास्तों पर चल फ़िल्म के अंत तक अपना जीवन दर्शन रचता है।

राज कपूर द्वारा निर्देशित ” मेरा नाम जोकर ” जो अपने समय में फ्लॉप हुई थी, भी अस्तिव ढूंढते नायक की कहानी थी। यह फ़िल्म मनुष्य जीवन के सार को परिभाषित करता सिनेमा है।

सिनेमा की बढ़ोतरी के साथ साथ यह अस्तित्ववादी सिनेमा भी अपने पूर्ण रूप में आया।

1980 में जहाँ फिल्मों में पूंजीवादी विचारधारा से लड़ता एक नायक जन्मा, वहीं “स्पर्श”, “आक्रोश”, “अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है” जैसे बहुत सी फिल्में ने भी सिनेमा में दस्तक दी, इन फिल्मों की पठकथा जीवन में मनुष्यता ढूंढते चरित्रों से सजी हुई थी।

” सारांश”, एक फिल्म, जहां बूढ़े दंपत्ति अपने जवान बेटे की मृत्यु के बाद भी अपने नए जीवन की खोज करते हैं। 1984 में बनी महेश भट्ट निर्देशित यह पूरी फ़िल्म जीवन की असीमता की एक तलाश है।

1980 के बाद, कुछ दृश्यों से पूरी फिल्म में अस्तित्ववादी भाषा ने अपने संवाद रचना शुरू किया। फिल्में सवाल करने लगी। समाज से ऊपर उठकर मनुष्यता के सवाल। जीवन दर्शन विषय पर फिल्में बनी। मगर यह सब बहुत धीमी गति के चला।

और आज भी यह अस्तित्ववादी दुनिया फिल्मों में बहुत हल्के हल्के अपने कदम बढ़ा रही है,लेकिन भारतीय सिनेमा में जब जब एक तरह का बोझिल सिनेमा हावी हुआ है, उसे तोड़ता हुआ नए जीवन की आस सा जन्मा है,यह जीवंत अस्तित्व के सवाल करता सिनेमा।

आज भी बहुत से फिल्मकार “सिनेमा मनुष्य का प्रतिबिंब है” को परिभाषित करते मनुष्यता की खोज को फ़िल्म का पहला द्वार मानते हैं। हिंदुस्तानी सिनेमा में आज जो यह सिनेमा बना रहे है उनमें पहला नाम है आनंद गांधी का, उनकी “शिप ऑफ थीसियस” फ़िल्म एक नायाब काम है अस्तित्ववादी सिनेमा का। इन्ही की तरह बहुत से और भी फिल्मकार है, जिनकी फिल्मों के कुछ दृश्यों में अस्तित्व जीवित है।

जिस तरह एक जीवन मे अस्तिव का मिलन धीमी आंच पर रखी एक कविता सा है, उसी तरह भारतीय सिनेमा में भी यह अस्तित्ववाद का सिनेमा अपनी प्राकर्तिक गति से बढ़ रहा है। और हाँ, जिस तरह बहुत से सामाजिक दायरों से लड़ती है, अस्तित्व की खोज, बिल्कुल वैसे ही भारतीय सिनेमा की सामाजिक अवस्थाओं से लड़ता रहा है, अस्तित्ववादी सिनेमा।


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One thought on “भारतीय सिनेमा और अस्तित्ववाद!!!

  • August 14, 2020 at 11:54 am
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    Bhaut khooob?❤️??

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