मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की माँग को खारिज़ करता हूँ!

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मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की माँग को खारिज़ करता हूँ!

 

मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की माँग को खारिज़ करता हूँ!


(कैद कवि वरवर राव के लिए)

मेरे पास कोई कविता नहीं जिससे
एक कवि को कैद से छुड़ा लाऊँ
मेरे पास ऐसे कोई शब्द नहीं जिनसे
मैं रोटी बना पाऊँ
या कोटि कोटि जन के
दुःख मिटाने वाले मंत्र बना पाऊँ
मेरे पास ऐसे कोई अक्षर नहीं जिससे मैं
एक विलाप को गायन में बदल पाऊँ!

कवि को कैद में रहने दो?
भूख को बने रहने दो?
विलाप को गायन क्यों बनाना?
दुःख मिटाने के लिए उठाओ शब्द नहीं कुछ और
कुछ और कुछ और!

मैं कविता शब्द और
अक्षर के दुःख और सुख जानता हूँ
मैं कवि की कैद को कविता की जय मानता हूँ
वे हथकड़ियां पराजित हैं
जो कवि को बंधक बनाया करती हैं

सृष्टि में भूख और रुलाई
सत्ता के मृत होने के संकेत हैं
हर आंसू शासक की मृत्यु है
हर यातना हर क्रूरता!

एक उदास तिनका यदि इच्छा के विपरीत जलाया जाए तो यह अग्नि की क्रूरता है!
एक उदास अक्षर एक शब्द यदि एक अपनी इच्छा के विपरित प्रशस्ति पत्र में जोड़ा जाए तो यह
संसार के हर शब्द की पराजय है!

यह एकदम जरूरी नहीं कि सत्ता अपनी पराजय की घोषणा करे स्वयं
वह अपनी हार की मुनादी करे और बताए कि वह हार चुकी है लोगों!
यह एकदम जरूरी नहीं कि वह एक कवि से भी स्वीकार करे अपनी हार?

हारी हुई सत्ता
आँसू की बूंदों में अपने प्रतिबिंब देख कर डरती है
हर पराजित राज्य भूख को भूल जाने के मंत्र खोज लेने की मुनादी करता ही है बार बार!

लेकिन वह हर आँसू के साथ मरता ही है!

मैं कवि को रिहा करने की माँग नहीं करता
किसी तानाशाह से
किसी सत्ता से कुछ भी मांगना
मुझे स्वीकार नहीं!

वह जो दे सकता है वह दे चुका है कवि को
वह जो दे सकता है दे रहा है विदूषक!

उससे पाने कि उम्मीद भी क्यों?
उससे मुक्ति की बात करो
उससे क्यों छुड़ाना कवि को याचना करके?
उससे आंसू और यातना के नए अर्थ क्यों पूछना?

कवि कैद में है
यह याद रहे तो भी सत्ता की पराजय है
कवि से सत्ता परेशान है यह याद रखना भी
कविता की जीत है!

उस इमारत को देखो
उसमें कवि नहीं
एक पराजित सत्ता कैद है
उस कवि को याद रखो
उसकी कविता को मंत्र बनाओ
आओ लोगों सत्ता को याद दिलाओ
कि एक बीमार कवि की कैद में है
एक पूरी सत्ता!

मेरे पास कोई कविता नहीं
जिससे कवि की रिहाई संभव हो
मैं ऐसे शब्द और अक्षर हीन हूँ
मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की मांग को खारिज करता हूँ !

बोधिसत्व, मुंबई

 

कैदी कवि वरवर राव

क्रांति की आवाज़ क्रांति से पैदा नही होती वरन क्रांति में रहकर पैदा होती है। हम वर्षों से क्रांति में रहने का अर्थ चढ़ती भीड़ में चार नारों के साथ चार लोगों की उपस्थिति से समझते आ रहे हैं जो बहुत अल्पकालिक है जिससे परिवर्तन की गुंजाइश अत्यंत क्षीण हो जाती है। जितने भी क्रांतिकारी रहे हैं उनकी आवाज़ तब ही बुलन्द हो पाई जब उन्होंने क्रांति में रहकर आवाज़ उठाई। उनकी आवाज़ भरसक शोर में भी सुनाई देती थी और मौन में भी बुलंद रहती। तब जाकर परिवर्तन रेवोल्यूशन से शुरू होकर एवोल्यूशन में तब्दील हो कर स्थापित होता था। यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है और एक सार्थक और कामयाब रेवोल्यूशन की सही प्रक्रिया भी यही ही है।

कल ही बोधिसत्व की एक कविता पढ़ी। कविता का शीर्षक था “मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की मांग को खारिज़ करता हूँ!” ज़ाहिर है यह कविता तेलेगु कैदी कवि वरवर राव के लिये थी। मैंने सरसरी नज़र से कविता पढ़ डाली। l मैं जानता था कि ऐसी कविता बोधिसत्व ही लिख सकते हैं। क्योंकि इन्हें मैं लंबे समय से पढ़ रहा हूँ.l.

कविता की शुरुआत कवि की आंतरिक बेबसी से हुई, लाचारी से हुई। शायद यह कवि का भय भी हो सकता है या गुप्प अंधेरे में पलने वाली एक रौशनी जिसकी हत्या अक्सर अंधेरे किया करते हैं। यह सच है कि जब हर आवाज़ उठाने वाले को आवश्यकता से ज़्यादा ग्लोरीफाई कर दिया जाता है तो उसकी मूल संवेदनाएँ मर जाती हैं उसकी आवाज़ किसी मोटिवेशन के चोले को पहन पहाड़ी के सबसे ऊँचे टीले से सुनाई देती है और पहाड़ी में ही गूंजती रहती है। बोधिसत्व शुरुआत में ही कहते हैं:

“मेरे पास ऐसे कोई अक्षर नहीं जिससे मैं
एक विलाप को गायन में बदल पाऊं!”

वरवर राव

वरवर राव

कविता कई प्रश्नों के साथ जब आगे बढ़ती है तो उसमें एक अलग प्रकार का आत्मविश्वास देखने को मिलता है। जैसा है वैसा ही दिखाने का प्रयास कविता करती है। किसी अन्य विचार का हस्तक्षेप मूल विचार में देखने को नहीं मिलता। जब एक रौशनी इतनी तीक्ष्ण है कि तमाम अंधेरे अपना माथा पीटने लगते हैं तब बोधिसत्व उस रौशनी को उसी अंधेरे में रहने की बात करते हैं जिससे कि आगे आने वाली रौशनियाँ अपना मार्ग स्वयं प्रशस्त कर पाएं। इसके चलते वरवर राव की बात करें तो कवि वरवर राव का जीवन परिवर्तन में बीता । चार दशकों तक वरवर राव तेलगु के शिक्षक रहे। उन्हें तेलगु साहित्य का एक प्रमुख मार्क्सवादी आलोचक भी माना जाता है। वरवर राव कई दफा सलाखों के पीछे भी रहे और पिछले दो साल से मुंबई के जेल में हैं। वरवर राव का क्रांतिकारी रवैया और आत्म विश्वास उनकी कविताओं में देखने को सामान्यतः मिल जाता है। वे एक जगह लिखते हैं:

“जब प्रतिगामी युग धर्म
घोंटता है वक़्त के उमड़ते बादलों का गला
तब ना ख़ून बहता है
न आँसू

वज्र बन कर गिरती है बिजली
उठता है वर्षा की बूंदों का तूफान
पोंछती है माँ धरती अपने आँसू
जेल की सलाखों से बाहर आता है
कवि का संदेश गीत बनकर”

ग़र किसी भी देश में किसी वाजिव आवाज़ के उठने पर उसकी आवाज़ सलाखों के पीछे कैद कर दी जाती है तो इसका अर्थ कतई यह नहीं है कि आवाज़े दबी हैं। इतिहास में ऐसे कितने लोग अमरता की शिलालेख पर अपना नाम अंकित करा चुके हैं जिनकी आवाज़ें सलाखों के पीछे कैद तो थी पर वे गूंजती रहीं और वही रौशनी आगे आने वाली रौशनियों के साथ मिलकर गुप्प अंधेरे में उजाला करती। इतिहास में कितने ही कवि सलाखों के पीछे रहे, बन्दी रहे पर उनकी आवाज़ें जन जन तक क्रांति के रूप में पहुंचती रही। अचंभे की बात यह भी है कि उन सबका मौन भी इतना सार्थक था कि एक चुप्पी लाखों लोगों के मन मे उथल पुथल पैदा कर देती। इस पर बोधिसत्व अपनी कविता में भी लिखते हैं कि:

“मैं कवि की कैद को कविता की जय मानता हूं
वे हथकड़ियां पराजित हैं
जो कवि को बंधक बनाया करती हैं”

बोधिसत्व की कविता शब्दों में बंधकर भी मौन साधे हुई है ऐसा मौन जो सत्ता पर तमाचा हो सकता है। ऐसा तमाचा जिसकी आवाज़ किसी को सुनाई भी न दे। आवाज़ें जब मिलती हैं तो मौन में परिवर्तित हो जाती है। मौन ही सबसे बड़ी आवाज़ है। बोधिसत्व अपनी कविता में एक जगह कहते हैं

“हर आँसू शासक की मृत्यु है”

इससे तेज़ तमाचा और क्या ही हो सकता है!

बोधिसत्व एक जगह यह भी लिखते हैं कि

“एक उदास तिनका यदि इच्छा के विपरीत जलाया जाए तो यह अग्नि की क्रूरता है!”

यह सच बात है कि यह सत्ता अब तक करती भी यही आयी है। किसी एक धर्म, किसी एक समुदाय या किसी एक विचारधारा पर अपना आधिपत्य जमा कर शासन करने को शासक नहीं कहा जाता उसे तानाशाह कहा जाता है। और तनाशाही किसी भी देश को ख़त्म कर सकती है आज नहीं तो आने वाले कुछ सालों में। कविता में एक पंक्ति कवि की आवाज़ को बुलंद करते हुए भी दिखती है। यहाँ बोधिसत्व कहते हैं

“मैं कवि को रिहा करने की मांग नहीं करता
किसी तानाशाह से
किसी सत्ता से कुछ भी मांगना
मुझे स्वीकार नहीं!

वह जो दे सकता है वह दे चुका है कवि को
वह जो दे सकता है दे रहा है विदूषक!”

बुलन्द आवाज़ किसी सत्ता के आगे बेफ़िज़ूली से झुकने की मोहताज़ नहीं होती वरन समाज मे कुरूतियों को दूर करने के लिए होती है। ग़र सत्ता इसे पचा नहीं पा रही है तो यहाँ सत्ता हारी है, सत्ता की पराजय है, आवाज़े हमेशा से बुलन्द रही हैं और आगे भी रहेंगी… बोधिसत्व की कविता में आत्मविश्वास जगह जगह जागता हुआ मिलता है इसी संदर्भ में वे अपनी कविता में लिखते हैं:

“कवि कैद में है
यह याद रहे तो भी सत्ता की पराजय है
कवि से सत्ता परेशान है यह याद रखना भी
कविता की जीत है!”

कविता अपने मर्म को जितना समेटे हुए होती है उतना ही मुक्त होती है। कविता की जीत सत्ता की हार है और सत्ता की हार कवि का सत्ता से परेशान होना है। बोधिसत्व अपनी अंतिम पंक्तियों में कविता का मर्म उड़ेल कर रख देते हैं। जैसी स्थितयाँ हैं वो वैसा ही दिखाने का प्रयास करते हैं कविता का अंत सोचने की शुरुआत है वे आख़िर में लिखते हैं :

मैं सत्ता से कवि की मुक्ति की माँग को खारिज़ करता हूँ!


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