रेप एक सांस्कृतिक-सामाजिक मुद्दा- देश को घुन लगने से बचाये !

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समय गतिमान है. आज के दौर में समय के साथ मुद्दे भी उसी गति से बदल जाते हैं. सोशल मीडिया ट्रेंड्स पर कुछ दिन बने रह जाना यानी एसईओ का बढ़िया उपयोग. ऐसे में इमोशन और गुस्सा और सामाजिक न्याय और अत्याचार की खबर का ट्रेंड पर पहुँच आना अपने आप में ही बहुत बड़ी बात है.

Hathras rape case the dhibri

एक दलित लड़की का उत्तर प्रदेश के हाथरस में रेप होता है और फिर उसे मार दिया जाता है. लड़की का पिता मदद को हर दरवाज़े पर ढूँढने निकलता है लेकिन हर दरवाज़े पर एक ताला जिसमें जात की चाभी लगती हो, लटकी मिलती है. संस्थागत तरीके से उसकी आवाज़ को दबाने का प्रयास होता है. कानून व्यवस्था का हुड़दंग आम आदमी को नँगा करता जाता है.

मीडिया और बलात्कार:

यह मीडिया जिसे प्रसिद्ध हिंदी फिल्म अभिनेत्रियों के गाँजा चरस खोजने से फुर्सत नहीं मिल रही थी उसके सामने एक बलात्कार का मुद्दा लगभग पंद्रह दिन बाद पहुँचता है. मीडिया जिसे टीआरपी के अलावा कुछ नहीं दिखता, मीडिया जिस पर ऊपरी क्लास का दबदबा है, मीडिया जो निकम्मी है और जिसका न्यूज़ एक न्यूज़ रूम में डिसाइड होता है, उस तक इस जघन्य अपराध का मुद्दा पहुंचता है, शुक्र हो उन छोटे और जुझारू पत्रकारों का जो डटे रहे न्याय के लिये और सरकारी तंत्र की निर्दयता के आगे घुटने नहीं टेके.

यह बात रवीश कुमार जैसे बड़े न्यूज़रूम के पत्रकार, जो शायद शब्दहीनों के आवाज़ हैं, वह भी मानते हैं. मीडिया अब अपनी शर्म में खुद डूब जाये तो अच्छा होता पर उसकी टीआरपी की भूख उसके सवालों को रंग देती है.

भूखी मीडिया के झूठे सवाल:

एक दलित लड़की का बलात्कार हुआ है और दलित समुदाय का एक हिस्सा इसपर विरोध प्रदर्शन कर रहा है, लगातार. इस सरकार और इस समाज के विरुद्ध जिसमें जाति व्यवस्था जैसी घुन लगी सामाजिक व्यवस्था का धड़ल्ले से प्रैक्टिस होता है. यही मीडिया जो नशेड़ी हीरोइनों की चैट्स और एक राज्य के लाल का केस सॉल्व कर रही थी, उसे कोरोना और सामाजिक समरसता की बात याद आई. सवाल यह उठाये जाने लगे कि आखिर इस कोरोना काल में प्रदर्शन क्यों? रेप तो रेप है, इसमें दलित शब्द पर ज़ोर क्यों? क्या लड़की का अस्तित्व उसके जाति तक में सिमट जाती है?

सवाल कितने तीखे और अगर आप प्रिविलेज बखूबी एन्जॉय करते हैं तो यह सवाल जरूरी और सही भी प्रतीत होंगे आपको. पर सच हमेशा एक स्तर नीचे बैठा होता है. उसे देखने को बस आँखें नहीं, थोड़ी मेहनत भी चाहिए होती है. थोड़ी अनलर्निंग जरूरी है.

विरोध प्रदर्शन की जरूरत इसलिए कि जो खबर हमतक पन्द्रह दिन बाद पहुँची वह पहुँची ही नहीं होती यदि प्रदर्शनकारी नहीं लगे होते. भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर बताते हैं, केस दर्ज कराने में भी उनके लोगों की मदद लेनी पड़ी थी पीड़िता के पिता को. तो कोरोना जिसके आँकड़े सरकार यूँ भुला दी है जैसे देश की जीडीपी हो.

Hathras rape case thedhibri

यह सरकार वैसे भी आँकड़े भूलती है, सनसनी याद रखती है. मीडिया उसी सनसनी को दुहराती है, एक अभ्यस्त और सीधे बच्चे की तरह. यह सवाल एक फेल्ड सरकारी तंत्र का है, विरोध प्रदर्शन क्यूँ? सरकार की बात कितने सभ्य तरीके से दुहराई जा रही है.

रेप के साथ दलित क्यों? इसके लिए रेप क्यों होते हैं यह समझना जरूरी है. रेप दरअसल पावर डायनामिक्स को मेंटेन करने के लिये होते हैं, औकात दिखाने को होते हैं, आसान भाषा में. यह बेरोज़गारी और बिना कंट्रोल का बढ़ रहा सेक्सुअल अर्ज के कारण नहीं होता. ऐसा होता तो न पैसे वाले रेप करते, न पढ़े लिखे और न ही शादी शुदा. रेप यह सब करते हैं, क्योंकि वह कर सकते हैं. रेप करने की मानसिकता यह ही है कि हम करेंगे क्योंकि हम कर सकते हैं. ठाकुर के लड़के एक दलित का रेप करते हैं,

यह सिंबल है, पावर का. ठाकुर के लड़कों के पास ठाकुर होने का दम्भ है. दलित की लड़की की आख़िर औकात ही क्या? तो यह बस लड़की का रेप नहीं है, इसमें कास्ट फैक्टर भी उतना ही मिला हुआ है. यह बलात्कार एक सांस्कृतिक-राजनीतिक स्थिति की उपज है.

निकम्मी पुलिस हाय हाय :

हाल के कुछ वर्षों में पुलिस यानि निकम्मापन की नई परिभाषा. वैसे तो हमेशा से पुलिस तंत्र, मजबूत के हाथ का एक यंत्र रहा है, पर विगत कुछ वर्षों में यह निरंकुश है. स्टेट की तरफ से उसे फ्री हैंड मिल चुका है. ऐसा लगता तो है यदि सरकारी शब्द इस बात का सिरे से इनकार कर दें.

पीड़िता के शव को आधी रात जबरन ठिकाने लगाया जाता है, घर वालों को कोई खोज-खबर नहीं दी जाती, शव नहीं सौंपा जाता, यह शव जलाना नहीं, ठिकाने लगाना ही है. कैमरे पर एक पुलिसवाला, पीड़ित के परिवार से यह कहते पाया जाता है कि थोड़ी गलती तो आप लोगों की भी थी. क्या जलाया जा रहा है उसपर आधी रात को डीएम से मिलिए का उल्टा प्रश्न दागा जाता है.

ऐसी व्यवस्था बाद में लॉ एंड आर्डर मेन्टेन करती है. अब आप और हम कितने सेफ हैं, यह आपकी और हमारी औकात निर्धारित करेगी.

सबसे आसान रास्ता :

एक सोशल मीडिया पर लेटर सर्कुलेट हो रहा जिसमें, पीड़िता का पिता यह मान गया है कि योगी जी की पुलिस उसे न्याय दिलाएगी. योगी जी से फोन वार्ता पर उसे यह आश्वासन दिया गया है. पिता जो अब तक मदद की गुहार लगाए फिर रहा था उसका अचानक से इस तंत्र पर विश्वास गहरा गया है. अजीब माया है.

अब प्रश्न करने वालों के मुँह बन्द कराए जायेंगे, आख़िर लड़की का बाप ही मान गया है, पर क्या सच में माना है? (यह प्रश्न आप सबके लिए, यदि जवाब हाँ है तो आगे ना बढ़ें, यहीं रोक दें)

आगे आसान रास्ता यही होगा की इमेज सुधारने के लिए एनकाउंटर किया जाये. नेता को समाज सुधारक, पुलिस को विघ्नहर्ता, और हमको फूल प्रूफ एंटरटेनमेंट मिलेगा. पर यह नहीं होने देना है. पूरा प्रोसेस हो, जिसकी दिक्कत है धीमे होती है, यह समाजसुधारक और विघ्नहर्ता उसे तेज करायें. पर न्याय तरीके से हो.

यह एक सेकलुडेड केस नहीं है, ऐसे आये दिन होते हैं, चीख को, रोष को उपयोगी बनायें, सवाल करें क्योंकि सवाल करना आपके अस्तित्व का सवाल है, मूक ना बनिये, अपनी स्पीशीज के मूल तत्व को ना भूलिये.

तबतक यह बलात्कार, हमारे स्थिति पर एक ठठा कर उठने वाले हास्य है, शर्मिंदा होइये.

 

लेख – अविनाश मिश्रा


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