धर्मयुग की यात्रा और धर्मवीर भारती जी

Spread the love

धर्मयुग की प्रारंभिक यात्रा

धर्मयुग टाइम्स ऑफ इंडिया  द्वारा निकलने वाली बहुचर्चित और प्रसिद्ध पत्रिका रही। इस पत्रिका की प्रसिद्धि का श्रेय यदि किसी सम्पादक को जाता है तो वो है डॉ धर्मवीर भारती।

सन 1950 में धर्मयुग का प्रकाशन बम्बई से शुरू हुआ। टाइम्स समूह की मालिक रमारानी जैन की यह कल्पना थी कि वह हिंदी में ऐसी पत्रिका का प्रकाशन करें जिसका आयाम वृहद और विस्तृत हो। जो सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिकोण को समाहित कर समाज मे बदलाव की रौशनी बने।

इस पत्रिका का सम्पादन आरम्भ में हिंदी साहित्य के कथाकार इलाचन्द्र जोशी ने किया। इसके बाद इनके भाई हेमचन्द जोशी ने इस काम का बेड़ा उठाया। परन्तु दोनों भाइयों की अल्पकालिक कार्यकाल के कारण इस पत्रिका का जिम्मा सत्यभान विद्यालंकार को सौंप दिया। और इन्होंने लगभग एक दशक तक इस पत्रिका का सम्पादन किया।

पत्रिका के सुचारू रूप से सम्पादन होने और लगातार समाज को योगदान देने के बावजूद धर्मयुग उस ऊँचाई तक नहीं पहुंच पाई जो मूलतः अपेक्षित थी

 

धर्मयुग पत्रिका

अपने आरम्भिक काम मे 32 पृष्ठ की निकलने वाली यह साप्ताहिक पत्रिका का छापांकन भीतर से श्वेत और श्याम होता था परंतु कवर पृष्ठ और मध्यवर्ती पृष्ठों पर पत्रिका में रंगीन चित्र छपते थे। धर्मयुग उस समय के संतों, समाज सुधारकों, राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं तथा साहित्यकारों के चित्र संक्षिप्त परिचय के साथ छापता था। इस पत्रिका में सांस्कृतिक तथा साहित्यिक पठनीय सामग्री की प्रचुरता तो रही परन्तु सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं की आलोचनात्मक  टिप्पणियों से यह पत्रिका वंचित रही।

जिस उद्देश्य से इसे निकाला गया उसकी पूर्ति करने में विद्यालंकार भी खरे नहीं उतरे। ऐसा नहीं था कि धर्मयुग में सिर्फ हिंदी की ही कविताएँ कहानियाँ, और लेख छपते थे, इसमें अन्य भाषाओं की कृतियाँ भी देखने को मिलती थीं और वैश्विक अनूदित साहित्य भी देखने को मिलता था।

 

धर्मयुग और भारती जी

6 सितम्बर 1960 को डॉ धर्मवीर भारती जी  ” धर्मयुग” के सम्पादक बने और नवम्बर 28 1987 तक अपनी सेवाएँ देते रहे। कुल 27 वर्ष तक भारती जी ने धर्मयुग और  समाज को अपनी सेवाएँ दीं और धर्मयुग को अपेक्षित ऊचाइयों तक पहुँचाया।

भारती जी ने धर्मयुग को एक नया रंग रूप देना शुरू कर दिया था जिसमें उन्होंने वैचारिक बातें, राजनीतिक विवाद, साहित्यिक बहसें, सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याओं पर अत्यधिक बल देकर ऐसी पठनीय सामग्रियों को पत्रिका में जोड़ा जो इन सम्बन्धित विषयों को कवर करती हों।

धीरे धीरे धर्मयुग अपने पाठकों के बीच एक ऐसा मंच बन गया था जो बहुआयामी होने के साथ साथ समाजोपयोगी दृष्टिकोण जन जन तक पहुँचा रहा था।

 

धर्मयुग और पाठक वर्ग

सन 1950 के आते आते हिंदी में ऐसी पत्रिकाएँ नगण्य हो गईं थीं जिसे आमजन अपनी जनभाषा में पढ़ सकें और उसे अपने जीवन मे उतार सकें। इन पत्रिकाओं का कोई भी स्पष्ट स्वरूप उभर कर नहीं आ रहा था।

स्थिति ऐसी थी या तो बहुत ही उच्च स्तर की पत्रिकाएँ थी या फिर ऐसी पत्रिकाएँ थीं जो उस समय के होने वाले घटनाक्रम को तो भली भाँति प्रस्तुत करती थीं पर बाद में समाज मे हो रहे विभिन्न मुद्दों पर अपनी बात नहीं रख पाए रही थीं।

इसी के चलते भारती जी ने धर्मयुग को उस रंग में प्रस्तुत किया जिससे पाठक अपने मानस पटल पर अत्यंत सुंदर चित्र बना सकें। इसी पत्रिका में प्रारम्भिक काल में विद्यानिवास मिश्र के निबंध, निर्मल वर्मा की कहानियाँ और नरेश मेहता की कविताएं छपी गयीं। धर्मयुग एक पाठक वर्ग तैयार कर चुका था।

लाज़मी है पाठक होने के साथ इस पत्रिका के आलोचक भी तैयार हो गए थे जिन्होंने इस पत्रिका की घोर आलोचना करी परन्तु उन तमाम आलोचनाओं के बावजूद भी धर्मयुग ने अपने पाठक न ही सिर्फ उत्तर भारत मे बल्कि दक्षिण भारत मे भी अर्जित कर लिए थे। धर्मयुग रचनाशीलता और सामाजिक रूपरेखा से तैयार हुई पत्रिका बन गयी थी।

धर्मवीर भारती

धर्मयुग की रूपरेखा इस प्रकार से थी कि उसमें दो कहानियाँ एक धारावाहिक, उपन्यास, सामायिक विषयों पर परिचर्चा व लेख, कई कई कविताएँ, एकांकी व्यंग्य, चुटकुले, फिल्मों से सम्बंधित लेख, बाल साहित्य एवं राशि भविष्य आदि सामग्री नियमित रूप से देखने को मिलती थी।

सन 1963 में धर्मयुग बच्चों के लिए सुंदर और रंगीन चित्रों के साथ ज्ञानवर्धक सामग्री लेकर प्रस्तुत हुआ। धर्मयुग ने एक “कार्टून कॉर्नर” की शुरुआत की जिसमें बच्चों से सम्बन्धित कार्टूनों को छापा जाता था।

 

धर्मयुग और पत्रकारिता

अपने 27 साल के कार्यकाल में भारती जी ने विभिन्न साहित्यकारों , चिंतकों, अर्थशास्त्रियों, शिक्षाविदों और विचारकों को धर्मयुग में स्थान दिया। हिंदी साहित्य के नगीने कहे जाने वाले मोहन राकेश, भीष्म साहनी, निर्मल वर्मा, जैसे महान साहित्यकारों की कहानियाँ, उपन्यास के अंश और लेख धर्मयुग में छपे।

हिंदी भाषी के साथ अन्य भाषियों का एक अद्भुत पाठक वर्ग तैयार करने के लिए भारती जी को युगों युगों तक याद रखा जाएगा।


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: