कॉमिक्स: एक कहानी

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हर बार वो हिचकिचाता है?” उसने पूछा

कुछ देर चुप रहते हुए उसने कहा – ” शायद हां ,, पर कभी कभी उसकी हिचकिचाहट मेरे सर पे भी चढ़ जाती है , मै अक्सर चुप हो जाती हूं, उस वक़्त वो मुझे समझ नहीं पाता है । उसके माथे पे हैरानी दिखती है ।”

“क्या तुम दोनों आपस में झगड़ते भी हो ?” रूप ने पूछा

“झगड़े वाली स्थिति में वो मुझसे डर जाता है , और कोशिश करते हुए मुझसे लिपट जाता है।  यही एक समय होता है जब उसकी हिचकिचाहट कम होती है । इसी कोशिश में वो मेरे होंठो को चूम लेता है और फिर …. ..मुझे उसपर दया आने लगती है । हम दोनों के रिश्ते में ये दया का भाव क्यों है, पता नहीं।”

वो दोनो समकोण सोफे के अलग – अलग रेखाओं पे बैठे थे । रूप उसका बैचमेट था । दोनों ने बाद में दो साल तक एक साथ, एक ही कंपनी में काम किया था। काफी वक्त बाद  रूप  दिल्ली आया था । सांभवी अक्सर रूप से अपने नए रिश्ते के बारे में बात करना चाहती थी ।

दोनों टेबल की तरफ देखने लगे । लग रहा था कि जैसे थोड़ा सा एकांत मेज के बीच में बैठा है। सांभवी की बातों के बाद दोनों काफी देर तक शांत रहे। दोनों अपने अपने हिस्से की बियर खत्म करने में लगे हुए थे 

 “तुम्हारी बहन बता रही थी कि तुमने जॉब छोड़ दी  है ।” रूप ने बियर मुंह में रखते हुए कहा।

“Offf, she is such a bitch … मुझे नहीं पता वो क्यूं मुझसे जलती है, मैंने उसे मना किया था कि इस बारे में किसी को मत बताना । वैसे हां मैंने जॉब छोड़ दी है।” 

तो फिर ?” रूप बोलते बोलते ठहर गया

सांभवी चुप रही । दोनों एक दूसरे से नज़रें हटाकर मेज को देखने लगें। बाहर शाम थी, और अंदर बार में अंधेरा।  वो दोनो  बार से बाहर निकल रहे थे । ऐसा लग रहा था कि वो रात से शाम में प्रवेश कर रहे हों । दिल्ली की पूरी सर्दी हल्की धुंध लिए शाम को हल्का नीला कर रही थी । कनॉट प्लेस की कुछ- कुछ दुकानों पे हल्की धुन का बंजारापन गूंज रहा था ।

दोनो ने एक जगह रुक के सिगरेट जलाई और धुआं एक दूसरे के माथे पर फूंक दिया । 

रूप ने आगे बढ़कर सांभवी के माथे पर अपने होंठ रख दिए। उसके सूखे होंठ सिगरेट की गर्माहट के साथ उसके माथे पर चिपक गए । सांभवी की आंख सूखी हुई थी। वो नजर झुका के जमीन पे तिनके देख रही थी, शायद वो गिन भी रही थी  और फिर अचानक वो रूप के सीने से लग गई । रूप उसकी पीठ पे थपकियां दे रहा था, सारी थपकियों से एक सांत्वना का सुर उठ रहा था । दोनो अब सामने देख रहे थे । रूप ने अब जाने के लिए सांभवी से पूछा  । वो चुप रही । दोनो कुछ देर तक वहीं खड़े रहे ।  

“सांभवी मुझे लगता है कि तुम्हे जॉब नहीं छोड़ना चाहिए था।  तुमने पूरे सात साल दिए थे इस कंपनी को। “

और तुमने दो साल,” सांभवी ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा

तुम्हे डर नहीं लगता फ्यूचर से,अब आगे क्या, और तुमने शादी भी यूं कि की …..  आई एम सॉरी।” रूप बोलते बोलेते चुप हो गया।

 “शायद अब तुम्हे चलना चाहिए,” सांभवी ने रूप को देखते हुए कहा  “और हां  रूही और श्रुति को मेरे हाय कहना ।” 

“परसो रूही का बर्थ डे है , तुम आ रही हो ना , उसने  तुम्हरी हैमलेट वाली कॉमिक्स पूरी ख़तम कर दी है। वो तुम्हे कुछ बताना चाहती है ,” रूप ने मुस्कुराते हुए बोला।

“कितने साल की हो जाएगी वो ?” सांभवी ने अचानक पूछा

“9 साल की” रूप ने कहा ।

“मै कोशिश करूंगी” ये कहते हुए वो रूप के गले लग गई। 

कुछ दूर टक उसने रूप को जाते हुए देखा, फिर वो भी अपने रास्ते पे मुड़ गई।

रास्ता काफी साफ था जैसे पूरी शाम में किसी ने कालिख भर दिया हो और सुनहले लैंप लटका दिए हों । पूरा बाज़ार चमक रहा था ।

सांभवी अचानक अपने बाएं तरफ वाली दुकान पर मुड़ी और दरवाजा खोल के अंदर की तरफ गई। वो एक बेकरी की दुकान थी। उसने एक खूबसूरत से सफेद केक की तरफ हाथ दिखाते हुए उसे पैक करने को कहा ।

दुकान वाले ने उसके कहने पर केक पर  ‘हैप्पी बर्थडे माई लव’ लिखा और फिर उसने ‘ट्वेन्टी टू (22)’ बोला  शायद दुकान वाले ने उम्र पूछी थी । दुकान वाले ने दो ‘2’ शेप के कैंडल भी पैक कर दिए। उसने दुकान पे पैसे देते हुए धन्यवाद किया ।

 उसने एक जगह रुक के सिगरेट सुलगाई और चलते हुए सिगरेट पीने लगी। उसके एक हाथ में सिगरेट था और एक हाथ में केक का पैकेट । वो अपना पर्स उसी दुकान पर भूल गई थी ।

दुकान वाले ने जब पर्स खोला तो उसमें सबसे पहले एक कैंसर स्पेशलिस्ट (डॉक्टर) की पर्ची थी, जिसपर लिखा था  ‘सांभवी’ उम्र 37 वर्ष, लाजपत नगर, नई दिल्ली ।


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