छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन

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गिरिजाकुमार माथुर साहित्य के वो हस्ताक्षर हैं जो बचपन से हर एक बच्चे के साथ यात्रा कर उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाये हैं। और अचंभे की बात ये है कि लंबे दौर तक बहुत लोगों को पता भी नहीं होता कि गिरिजा कुमार माथुर उनके साथ हमेशा से हैं। कई आंदोलनों में, कई प्रार्थनाओं में और कई सभाओं में उनकी उपस्थिति बहुत सहज और सार्थक रही है। किसी व्यक्ति की अभिरुचि पर एक गहरी मोहर लगाने का काम भी माथुर साहब सालों से करते आ रहे हैं… आप सोच रहे होंगे कैसे?
जब कभी किसी व्यक्ति ,किसी संस्थान, किसी समाज, किसी राज्य या किसी देश का आत्मविश्वास गिरने लगता है तो जो गीत उसका हमसफ़र बन उसके साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ता है वह माथुर साहब से भी जुड़ा हुआ है। आप समझ गए होंगे मैं बात कर रहा हूँ”हम होंगे कामयाब एक दिन” की ….यह गीत गिरिजा कुमार माथुर ने लिखा जो अंग्रेज़ी का लोकप्रिय गीत “we shall over come” का हिंदी अनुवाद है। यहीं से माथुर साहब ज़्यादतर लोगों की ज़िंदगी में छाप छोड़ते हैं।

दसवीं कक्षा की हिंदी पाठ्यपुस्तक में गिरिजा एक बार और हर बच्चे की यात्रा में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। “छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन”..यह कविता मानो जीवन की एक पीड़ा बन सामने उभर कर आई। एक बेबसी और जो अनमनापन भीतर ही कसोट रहा था उसकी अभिव्यक्ति बन यह कविता उभर कर आई। कवि के अपनी निजी अभिव्यक्ति के बावजूद यह कविता उस दौर के हर उदास व्यक्ति का गीत बन गयी थी और आज तक प्रासंगिक है।

“छाया मत छूना मन
होता है दुख दूना मन

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।

भूली-सी एक छुअन
बनता हर जीवित क्षण
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

यश है न वैभव है, मान है न सरमाया;
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है, 
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।

जो है यथार्थ कठिन
उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्‍या हुया जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?

जो न मिला भूल उसे
कर तू भविष्‍य वरण,
छाया मत छूना मन
होगा दुख दूना मन

एक ओर गिरिजा उदासी का स्वर बने वहीं दूसरी ओर युवाओं के लिए प्रोत्साहन और अभिप्रेरणा की बुलन्द आवाज़ बन उभर कर आये। उनकी कविता
“मेरे युवा-आम में नया बौर आया है” एक दिशा और मार्गदर्शन का काम करती है।

“मेरे युवा-आम में नया बौर आया है
ख़ुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है

आएगी फूल-हवा अलबेली मानिनी
छाएगी कसी-कसी अँबियों की चाँदनी
चमकीले, मँजे अंग चेहरा हँसता मयंक
खनकदार स्वर में तेज गमक-ताल फागुनी

मेरा जिस्म फिर से नया रूप धर आया है
ताज़गी बहुत है क्योंकि तुमने सजाया है।

अन्धी थी दुनिया या मिट्टी-भर अन्धकार
उम्र हो गई थी एक लगातार इन्तज़ार
जीना आसान हुआ तुमने जब दिया प्यार
हो गया उजेला-सा रोओं के आर-पार

एक दीप ने दूसरे को चमकाया है
रौशनी के लिए दीप तुमने जलाया है

कम न हुई, मरती रही केसर हर साँस से
हार गया वक़्त मन की सतरंगी आँच से
कामनाएँ जीतीं जरा-मरण-विनाश से
मिल गया हरेक सत्य प्यार की तलाश से

थोड़े ही में मैंने सब कुछ भर पाया है
तुम पर वसन्त क्योंकि वैसा ही छाया है”

यह दोनों कविताएँ इस बात का प्रमाणित प्रमाण हैं कि
गिरिजा कुमार माथुर जीवन के दोनों छोरों पर अपनी छाप छोड़ने वाले एक अनोखे कवि रहे हैं।

गिरिजा कुमार माथुर

माथुर साहब का जन्म 22 अगस्त सन 1919 में मालवा क्षेत्र के अशोक नगर में हुआ। इनके पिताजी “देवीचरण माथुर” पेशे से शिक्षक थे और वाङ्गमय (यानी संस्कृत साहित्य) के प्रबुद्ध जानकार। वे कविताएँ लिखते थे और साथ ही सितार बजाने में निपुण थे। इनका कवित्त, सवैये एवं दोहे का संकलन ‘तत्व ज्ञान” नाम से प्रकाशित भी हुआ। चूँकि इनका सम्बन्ध मालवा से था और ये स्वयं संगीत में रुचि रखते थे तो गिरिजा कुमार माथुर की मुख्यतः कविताओं में प्रकृति और संगीत का परस्पर मिलन आसानी से देखने को मिल जाता है। इनकी माँ “लक्ष्मी देवी” मालवा की ही रहने वाली थीं और शिक्षित भी थीं। साहित्य का वातावरण इनके परिवार में शुरू से रहा। 1901 में छपने वाली पत्रिका “सरस्वती” इनके घर मे नियमित रूप से आती थी। इनके पिता बालक गिरिजा को हितोपदेश के श्लोक समझाते थे और बालक उन्हें याद करता।

गिरिजा कुमार माथुर ने अपनी इंटरमीडिएट की परीक्षा झांसी से की और स्नातक ग्वालियर से किया। स्नातक के आखिरी साल तक आते आते गिरिजा कुमार माथुर सवैये कवित्त, दोहे पर अपनी पकड़ बना चुके थे। चूंकि वह छायावाद का समय था तो उनकी लेखनी पर महादेवी पंत और निराला का प्रभाव बहुत पड़ा। सन 1936 में माखनलाल चतुर्वेदी जी द्वारा सम्पादित पत्रिका “कर्मवीर” में इनकी पहली कविता छपी जो बाद में सन 1941 में उनके पहले कविता संग्रह मंजीर में भी छपी। जिसकी भूमिका महाकवि निराला ने लिखी। लखनऊ में एम ए करते वक़्त गिरिजा की मुलाकात रामविलास शर्मा से हुई जिन्होंने माथुर को निराला से मिलवाया। निराला ने इनके संग्रह की भूमिका केवल इसलिये नहीं लिखी क्योंकि यह किसी नए कवि का संग्रह है बल्कि निराला ने कविताओं की अंतर्वस्तु में प्रवेश कर उनके काव्य की सराहना की। इसके बाद इनके अनेक काव्य संग्रह प्रकाशित हुए जिसमें नाश और निर्माण , धूप के धान, शिलापंख चमकीले, जो बन्ध नहीं सका, साक्षी रहे वर्तमान, भीतर नदी की यात्रा, मैं वक़्त के हूँ सामने तथा छाया मत छूना मन आदि मुख्य काव्य संग्रह हैं। सन 1945 में जब अज्ञेय जी ने तार सप्तक का संपादन किया तो उस दौर के प्रमुख सात कवियों को उस संकलन में रखा। गिरिजा कुमार माथुर भी उन्हीं में से एक थे.. हालाँकि तार सप्तक के आने से पहले ही गिरिजा अपना नाम कुछ शुमार कवियों के बीच बना चुके थे। तार सप्तक से उन्हें एक अलग पहचान मिली। सन 1943 से गिरिजा कुमार माथुर ने ऑल इंडिया रेडियो में अनेक पदों पर रहते हुए अंग्रेज़ी और उर्दू के वर्चस्व के बीच हिंदी को पहचान दिलाई। और वे दूरदर्शन में उप महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए। सन 1955 में गिरिजा कुमार माथुर का एक दूसरा रूप देखने को मिला जब उनका खंड काव्य “पृथ्वी कल्प” प्रकाशित हुआ। पृथ्वी कल्प ने यह सिद्ध कर दिया था कि उनकी कविताओं में सिर्फ रंग, रूप, रस और भाव ही नहीं है वरन विज्ञान भी है
दर्शन भी है तर्क भी है और अध्ययन भी है। सन 1991 में अपना काव्य संग्रह “मैं वक़्त के हूँ सामने” के लिए हिंदी का साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला और सन 1993 में के के बिरला फाउंडेशन द्वारा व्यास सम्मान भी प्राप्त हुआ।

माथुर साहब , महाकवि निराला और बाक़ी दो कवि

बालक गिरिजा का बचपन गंवई परिवेश में बीता। गिरिजा कुमार माथुर की कविताओं में जो लोक देखने को मिलता है उसका पोषण उनके गाँव से ही हुआ। गाय के गले की घण्टियाँ, चिड़ियों का कलरव मन्दिर की घण्टियों की अनुगूँज उनके गीतों और कविताओं के सौंदर्यबोध में परिलक्षित होती हैं। मालवा में बीते बचपन के दिन उनकी कविताओं में रह रह कर देखने को मिल जाते हैं। उनकी कविताओं और प्रकृति के बीच जो एक तादत्मयता बनी रही उसका श्रेय वे स्वयं मालवा के क्षेत्र में बिताए बचपन को देते हैं।

वे एक जगह लिखते हैं कि
” मीलों दूर तक विस्तार लाल पठार हैं और उसके साथ ही काली मिट्टी के सांवले खेत आरंभ हो जाते हैं. इमली, सेमल, नीम, खजूरों के झुरमुट, पलाश, खिरनी, जामुन, आम, महुवे, चिरौंची और ताड़ के वृक्षों से छाया हुआ यह प्रदेश है जहाँ के ढूहों, टौरियों, टीलों के घुमावदार कटावों के बीच से चट्टानी नदियाँ बहती हैं. अनेक जंगली बरसाती नाले और छोटी-छोटी बलखाती खजूर के झुरमुटों के बीच बहती ये वही अनहोनी रम्य नदियाँ हैं जो दक्षिण से उत्तर की ओर बह कर जमुना में मिलती हैं.”

गिरिजा कुमार माथुर हमेशा कविता को अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम मानते रहे। उनका मानना था कि कविता हर उस शक्ति की आवाज़ है जिसका समाज में दमन और शोषण हुआ है।

अपनी किताब “मुझे अभी और कहना है” में वह लिखते हैं कि
“कविता यथार्थ जीवन और व्यवस्था के तमाम संघर्ष, संताप और अन्याय, विकृति, पाप और विरोधाभासों पर पड़े पर्दों को हटाती है। आदमी के जीवन को जो शक्तियाँ कुंठित, दमित और शोषित करती हैं, मानवीय गरिमा और उसके सांस्कृतिक अधिकारों को छीनती है उन्हें हटाने में कविता की सक्रिय और सशक्त भूमिका होती है।”

ऐसे संसार मे तमाम लोग हैं जिनका विद्रोह करने का तरीका विपक्ष को मुँह की खाने पर मजबूर कर देता है। उनमे से गिरिजा कुमार माथुर भी थे। मुस्कुरा कर आशंका जताने की क्षमता गिरिजाकुमार माथुर में देखने को सामन्यतः मिल जाती है…यह विलक्षण प्रतिभा उनकी एक कविता “दो पाटों की दुनिया” के एक छोटे से अंश में देखने को मिलती है:

“खास बात ये भी है कि
दो पाटों की दुनिया
चारों तरफ शोर है,
चारों तरफ भरा-पूरा है,
चारों तरफ मुर्दनी है,
भीड और कूडा है।

हर सुविधा
एक ठप्पेदार अजनबी उगाती है,
हर व्यस्तता
और अधिक अकेला कर जाती है।

हम क्या करें-
भीड और अकेलेपन के क्रम से कैसे छूटें?

राहें सभी अंधी हैं,
ज्यादातर लोग पागल हैं,
अपने ही नशे में चूर-
वहशी हैं या गाफिल हैं,

खलानायक हीरो हैं,
विवेकशील कायर हैं,
थोडे से ईमानदार-
हम क्या करें-
अविश्वास और आश्वासन के क्रम से कैसे छूटें?

तर्क सभी अच्छे हैं,
अंत सभी निर्मम हैं,
आस्था के वसनों में,
कंकालों के अनुक्रम हैं,

प्रौढ सभी कामुक हैं,
जवान सब अराजक हैं,
बुध्दिजन अपाहिज हैं,
मुंह बाए हुए भावक हैं।

हम क्या करें-
तर्क और मूढता के क्रम से कैसे छूटें!

हर आदमी में देवता है,
और देवता बडा बोदा है,
हर आदमी में जंतु है,
जो पिशाच से न थोडा है।

हर देवतापन हमको
नपुंसक बनाता है
हर पैशाचिक पशुत्व
नए जानवर बढाता है,

हम क्या करें-
देवता और राक्षस के क्रम से कैसे छूटें”

गिरिजा कुमार माथुर की कविताओं में सामाजिक चेतना, समाजिक विफलता, निराशा और विषाद की प्रधानता भी देखने को मिलती है। सन 1946 में गिरिजा का एक काव्य संग्रह “नाश और निर्माण” प्रकाशित हुआ।

जिसके सन्दर्भ में डॉ द्वारका प्रसाद सक्सेना का मत है कि ” इस संकलन में प्रणय के स्वर की प्रबलता है, विषाद एवं निराशा की प्रधानता है, अतीत की सुखद स्मृतियाँ हैं, रोमानी भावों की दिव्य आभा है और प्रेम निरूपण में वासना एवं भोग का पुट होते हुए भी चित्रण में नवीनता है”

इनके इस संकलन अकविता भरपूर देखने को मिलती है बाक़ी कविता संग्रह से यह संग्रह अत्यंत यथार्थ और प्रयोगवाद से भरा हुआ है। इसका एक उदाहरण इसी संग्रह की एक कविता मशीन का पुर्जा में देखने को मिलता है

“शीत हवा में ठंड के सात बजे हैं
ठिठुरन से सूरज की गर्मी जमी हुई है
सारा नगर में लिहाफों में सिकुड़ा सोता है
पर वह मजबूरी से कंपता उठ आया है
रफू किया उसका स्वेटर तीन सर्दियाँ देख चुका है
उसका जीवन जीवनहीन मशीन बन गया
जाड़ों के दिन की मिठास अब जमी हुई है!”

जनवरी सन 1994 में गिरजा कुमार माथुर अपने शब्दों के दर्पण में अपना चेहरा पढ़ रहे थे। जनवरी 94 में गिरीजा कुमार माथुर हमें कविताओं की गूंज, गीतों की लय आंतरिक दर्शन और तारतम्य जीवन छोड़ कर चले गए।

डॉ ओम निश्चल लिखते हैं ” हिंदी कविता में जब जब मनुष्य के राग, उसके सौंदर्य व दुनियावी यथार्थ और युद्धों की आशंकाओं से जूझती हुई पृथ्वी की बात होगी, माथुर का काव्य एक दर्पण के भाँति हमारे सम्मुख होगा।”


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One thought on “छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन

  • July 17, 2020 at 6:01 am
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    हेमन्त भाई अच्छा लिखे हो ? इस सामूहिक प्रयास के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं ?

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