बोल की लब आज़ाद हैं तेरे

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आज़ादी ज़िंदगी का एक ख़ुशनुमा एहसास है और हम हर एहसास को बयां करने के लिए आज़ाद भी हैं। क्योंकि हमारा संविधान हमे ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ का मौलिक अधिकार देता है। तभी तो हम कहते रहते हैं।

“बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले”

अभिव्यक्ति की उत्पत्ति

1689 में इंग्लैंड के विधेयक ने सवैधानिक अधिकार के रूप में इसे अपनाया।उनके बाद फ्रेंच ने भी 1789 में अपने नागरिकों के लिए इस अधिकार की घोषणा की।1948 में मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा अपनाई गई थी।इस घोषणा के बाद अभिव्यक्ति की आजादी अब अंतरराष्ट्रीय कानून का हिस्सा गई है और अभी लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों को यह मूल अbधिकार प्राप्त है।भारत के संविधान के अनुसार आर्टिकल 19 में भारतीय नागरिकों की ‘वाक् व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता'( Freedom of Speech and Expression) का उल्लेख है।

क्या है आर्टिकल 19 (1) और 19(2) ?

अनुच्छेद 19 (1) के तहत हमारे मौलिक अधिकार तय किये गए है। 19 (1) को 6 भागों में बांटा गया है।
सभी नागरिकों को–
(क) बोल कर,लिख कर अपने विचार प्रकट करने का,
(ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन का,
(ग) संगम या संघ बनाने का,
(घ) देश में ध्वजारोहण करने का,
(ङ) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग रहने का
(छ) कोई उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार प्राप्त है।

आर्टिकल 19(1) जहां मौलिक अधिकारों की बात करता है, वहीं आर्टिकल 19 (2) इन अधिकारों को सीमित भी करता है। अनुच्छेद 19 (2) में कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से किसी भी तरह देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को नुकसान नहीं होना चाहिए। इन तीन चीजों के संरक्षण के लिए बनाये गए कानूनों का खंडन करने वाले पर उपयुक्त कार्यवाही हो सकती है।

वर्तमान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

*हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कश्मीर में लगे इंटरनेट के बैन को यह कह हटाया गया है, यह भी कहा गया कि यह अभिव्यक्ति की आजादी का एक हिस्सा है,इस पर प्रतिबंध रखना शक्ति का दुरूपयोग है।यदि इंटरनेट अभिव्यक्ति का माध्यम है तो फिर वहां व्यक्त किये जाने वाले विचारों पर विवाद क्यों?*

साल 2017 के अप्रैल में गुरमेहर कौर ने रामजस कॉलेज में एक विवाद के बाद सोशल मीडिया पर स्टूडेंट्स अगेंस्ट एबीवीपी और सेव दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे कैंपेन चलाए थे।तो इसके बाद उस छात्रा को बलात्कार की धमकियां मिलने लगी।इसके बाद 2016 में सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए गुरमेहर के एक वीडियो पर कंट्रोवर्सी भी हुई। इसमें उन्होंने कहा था- ‘मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, बल्कि जंग ने मारा था’,पर इस कथन के कारण उसकी मानसिकता पर सवाल उठाये जाने लगे।

अभिव्यक्ति के ऐसे कई मामलात हैं जिन पर बहुत विवाद होते आये है,ऐसे बहुत से नाम है जिन्हें अपने विचार बोलने,लिखने,छापने पर देशद्रोही तक करार दिया जाता है।
छोटे से लेकर बड़ा व्यक्ति अपने आप विचार अभिव्यक्त तो करता है पर बाद में खुद को सवालों के घेरे में पाता है।

एक बार अभिनेता ऋषि कपूर को भी घेरा गया जब उन्होंने एक ट्वीट किया “दिल्ली में सड़कों के नाम बदल सकते हैं तो कांग्रेस के एसेट्स और प्रॉपर्टी के नाम क्यों नहीं? चंडीगढ़ में भी राजीव गांधी के नाम पर एसेट्स? सोचो? क्यों? हम देश की अहम जगहों के नाम उन लोगों के नाम पर रखने चाहिए, जिन्होंने सोसाइटी को कुछ दिया है। हर चीज गांधी के नाम ही क्यों? मैं इससे सहमत नहीं हूं।”

ऐसा नही है कि यह आजादी असीमित है,इस पर युक्तियुक्त निर्बंधन (Reasonable Restrictions) हैं।वकील प्रशांत भूषण पर भी सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के आरोप लगे और एक रुपए का जुर्माना लगा कर उस असहिष्णुता की भरपाई की गई।

जहां मीडिया और इंटरनेट के साधनों ने लोगों के विचारों में खुलापन दिया है, वहीं वैचारिक व भाषाई टकराव के कारण यह प्लेटफार्म बदजुबानी का एक उदहारण होते जा रहे हैं।
सोशल मीडिया एप्प्स जब तक शेयरिंग केयरिंग की नीति पर चल रहे थे,ये लोगों को जोड़ रहे थे।अधिक विस्तार और बढ़ते प्रयोग के साथ साथ यह लोगो को हर भाव को समेटने लगा है।प्रेम,घृणा,रोष,प्रोत्साहन सभी भावों का सामंजस्य यहां देखने को मिलता है और कब वह भाव राजनीतिक टिप्पणी का रूप ले, पता नही।सोशल मीडिया पर शब्दों को अपशब्द होते देर नही लगती जैसे कमान से निकला तीर,मुँह से निकली बात वापिस नही लौटते वैसे ये अपवाद भी जल्दी शांत नही होते।

इस दौर में आजादी की परिभाषा के मायने बदल रहे है या फिर हम लोग अपनी सीमाएं भूल रहें है, कोई तो कारण होगा की एक मौलिक अधिकार का दुरुपयोग का स्तर बढ़ता जा रहा है।शायद हमने रट लिया है ‘बोल की लब आजाद है तेरे’


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