बाज़ारवाद की गमक त्यौहारों तक

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बाज़ारवाद और त्यौहार

जस-जस आधुनिकीरण, बाज़ारवाद और त्यौहार में घुसता जा रहा है तस-तस टीस बढ़ती जा रही है। ये सब हमारी मोहक संस्कृति को लीलते जा रहे हैं। तीज-त्यौहार तो अब ऐसे आते हैं जैसे पार्क में भटकता हुआ बच्चा, जिसकी गेंद खो चुकी है। त्यौहार का सौंदर्य तो गीत और पकवानों से ही है। अब वही गायब हो चले हैं। आधुनिकता इन पर काले बादल की तरह आई है।

सावन चल रहा है। सावन में प्रकृति ब्याहकर आई दुल्हन जितनी सुंदर लगती है। लोकगीत; जो इस दुल्हन के श्रृंगार जैसे हैं, वो अब सुनाई ही नहीं पड़ते। सुनाई भी आएंगे तो ऐसे अश्लील गीत जिसकी फूहड़ता का कोई अंत नहीं! बिन गीतों के सावन कैसा है?

” कोयल बिन बगिया ना सोहे राजा. ” ऐसा!

पहले का दौर था। सावन के प्रवेश करते ही सब स्वागत में लग जाते थे। झुलुआ पड़ता था। कजरी गाई जाती थी। धान के खेतों की तरह औरतें चमकती थीं। उल्लासित स्वर में वो गीत कढ़ातीं-

” बरसन लागीं बदरिया रूम-झूम के..”

 

सावन के झूले

धरती भी इस लय से झूम जाती। फसलें भी लहलहा उठती थीं। पुराने लोगों की उमंग देखने लायक होती थी। जब चारों ओर हरीतिमा की चादर ओढ़े प्रकृति अंगड़ाई लेती थी तब सबका मन हुलस जाता था।

” आयो सावन अति मनभावन
झूम-झूम सखियाँ गाएं कजरिया
रूम-झूम के
घूम-घूम के
बरसन लागी बदरिया..”

अपनी जड़ों से कटना अब फैशन हो चला है। आधुनिकता की होड़ में सब छूटता जा रहा। गिन चुन के कुछ लोग बचे हैं जो सब जीवित रखे हैं। इसके बाद तथाकथित संस्कृति के रक्षक हैं जिन्हें संस्कृति से कुछ लेना नहीं। उन्हें बस हंगामे खड़े करने हैं। इसी हंगामे के बीच ऐसे लोग भी हैं जो शांति से अपना काम किए जा रहे हैं।

मेरी ही धरती के एक अनन्य सरस्वती-पुत्र हुए हैं- पंडित छन्नूलाल मिश्र जी। मेरी धरती कहना अनुचित होगा। मैं उनकी धरती से आता हूँ। मिश्र जी ने कठोर साधना की और शास्त्रीय गायकी का हुनर साधा। कजरी,चैता ठुमरी,दादरा सब गाते हैं। कजरी के भी प्रकार होते हैं। मिर्ज़ापुर की कजरी। जौनपुर की कजरी। बनारस की कजरी। आज़मगढ़ की कजरी। पंडित जी सारी रस लेकर सुनाते हैं। मन सावन हो उठता है।

छन्नू लाल मिश्र जी

पिता बताते हैं कि मेरे बाबा फगुआ गाते थे। झाल बजाते थे। पहले लोगों में कितना सौहार्द होता था। मुझे याद है मेरे घर के सामने नीम का एक पेड़ होता था। सावन आते ही हम लोग हेंगी, बाँस, टायर, छड़ इत्यादि जुहाने-जुटाने लगते थे। उस पेड़ पर झुलुआ पड़ता था। दिन भर हम लोग उसपे झूलते और गीत गाते थे। बड़ों की मंडली आती तो लहकार के झूलती। सब कितना अनुपम था। लोग एक-दूजे के लिए तत्पर रहते थे। कुछ दिनों पहले ही मैंने पिता से पूछा ये इतनी भारी कोल्हू वाली पथरी कहाँ से आयी? इस पर उन्होंने कहा कि पाँच किलोमीटर दूर से आई। गाँव के लगभग बीस लोग सात दिन में धकेलकर लाए थे। ये सुनकर मैं विस्मय में पड़ गया। अभी कुछ दिनों पहले ही गाँव में एक आदमी गरीबी से तंग आकर फाँसी लगा लिया। लोग साथ मिलकर पथरी धकेल लाए विस्मय तो होगा ही!

जड़ों से कटके किसी का भला नहीं होने वाला। स्मृति धुँधली हो रही है। एकदम से मिट जाए इसके पहले हमें लौटना होगा। किसी का कथन है न- वेदों की ओर लौटो। तो साथी जड़ों की ओर लौटो। उठाओ हेंगी, गढ़ो बाँस और टाँग लो झुलुआ। उसके बाद लहकार के गाओ। गाओ और देखो ये प्रकृति जिसे तुम रूठा हुआ बता रहे हो, कैसे तुम्हारे साथ सुर मिलाती है। गाओ।

– नीरव


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