“बहुत हुआ सम्मान” :मीठे हंसगुल्ले के साथ चबाइए सामाजिक, राजनीतिक वास्तविकता का कड़वा नीम।

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व्यंग,अगर एक तरफ आपको मीठे-मीठे ठहाकेदार हंसगुल्ले खिलाता है, तो वहीं दूसरी तरफ, चखाता है, वास्तविक कड़वे नीम के पत्ते। नीम के पत्तों की यह खासियत है कि इन्हें चबाने से आपका खून साफ रहता है, इसलिए सामाजिक, राजनीतिक गंदगी की सफाई हेतु, हँसते हुए मीठे रसगुल्लों के साथ,कभी कभी चबा लेने चाहिए, व्यंग के कड़वे नीम के पत्ते।

रसगुल्ले और नीम के अनूठे मिश्रण जैसी ही एक अतरंगी फ़िल्म, इस दो अक्टूबर को डिज़नी हॉटस्टार पर रिलीस हुई, नाम है “बहुत हुआ सम्मान”। फ़िल्म के निर्देशक हैं आशीष शुक्ला और लीड रोल में हैं संजय मिश्रा, अभिषेक चौहान और राघव जुयाल।

बैठो भैया,सुनो कहानी:

दो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के बेरोजगार,फेलियर इंजीनियरस, बोनी और फंडू को मिलते हैं, बकचोद बाबा, (हाँ यही नाम है इस पात्र का), जो पूँजीवाद के साम्राज्य को ध्वस्त करने हेतु बैंक लूटने का प्लान बनाते है। प्लान A,B,C के बाद प्लान D फाइनल किया जाता है। प्लान पूरा होने से पहले ही बोनी और फंडू पकड़े जाते हैं और बैंक कोई और पार्टी लूट लेती है। बैंक के लॉकर में नेता जी के खुफिया दस्तावेज हैं, कहानी इन्हीं दस्तावेजों को ढूंढने के इर्द गिर्द घूमती रहती है।

  ( संजय मिश्रा, अभिषेक चौहान और राघव जुयाल)

डायलॉगबाज़ी का भौकाल:

आज की सामाजिक,राजनीतिक स्तिथि पर मीठे और करारे कटाक्ष मारते फ़िल्म के डायलॉग्स इस सिनेमा का दिल हैं। अविनाश सिंह और विजय नारायण वर्मा ने डायलॉग्स की बनावट में बिल्कुल नपे तुले हाथ रखे हैं, जिस वजह से कोई भी व्यंग या हास्य व्यंग आपको चुबता नहीं है मगर सोचने पर विवश जरूर करता है। संजय मिश्रा यानी ‘बकचोद बाबा’ की जिव्हा से निकले अनमोल प्रवचन तो इस दुनिया में चली आ रही राजनीतिक, सामाजिक कुव्यवस्थाओं पर,भिगो भिगो के जूता मारते, घनघोर चांटे रसीदते, कर्रे संवाद हैं। 

“क्रांति का भाव रुक गया,तो विचारों की नदी,कट्टरवाद का नाला बन जाएगा”।

बकचोद बाबा का यह डायलॉग इस फ़िल्म का सार है।ऐसे बहुत से संवाद इस फ़िल्म में हैं,जो पूंजीवाद,उपभोक्तावाद की विफलताओं पर हँसते हँसते बात कर रहे हैं।इन्ही के साथ ठहाके मारते बहुत से डायलॉग भी आपको इस फ़िल्म में सुनाई देंगे। छोटे से छोटे पात्र को कमाल से कमाल डायलॉग से सजाया गया है इस फ़िल्म में। तो भाई साहब इस फ़िल्म की डायलॉगबाज़ी का भौकाल बहुते टाइट है। फ़िल्म इस डिपार्टमेंट में अव्वल आती है।

(संजय मिश्रा)

नए ढंग का निर्देशन:

आशीष शुक्ला का निर्देशन स्टाइलिश है। फ़िल्म को कॉमिक्स की तरह सजाया गया है जो अपने आप में एक अतरंगी विचार है, सिर्फ फ़िल्म की शुरुवात में यह अजीब लगता है, मगर जैसे ही आप फ़िल्म में इन्वॉल्व हो जाएंगे आपको यह नार्मल लगेगा। फ़िल्म में पुराने गानों का प्रयोग भी काफी रचनात्मकता से किया गया है। हर किरदार को अपना स्पेस दिया गया है, जिससे वह खिल कर हमारे सामने प्रस्तुत हुए हैं। आशीष शुक्ला पर हॉलीवुड डायरेक्टर कुएन्टीन टारनटिनो का प्रभाव या प्रेम फ़िल्म में साफ नजर आता है, संजय मिश्रा को कमाल का एक्शन करते सोच पाना इस निर्देशक का विशन दर्शाता है। मगर इन सभी में फ़िल्म थोड़ी फैली हुई दिखाई दी, कुछ जगह पर कमाल का निर्देशन मिलता है तो कुछ जगह पर औसत। फ़िल्म के बहाव का न होना, इस निर्देशन की एक कमी लगी,लेकिन इन सबके बावजूद भी फ़िल्म के कैरेक्टर को पकड़े रहे आशीष शुक्ला और एक औसत से ऊपर की फ़िल्म बनाने में कामयाब रहे।

आओ एक्टर एक्टर खेलें:

“बकचोद बाबा” के किरदार में संजय मिश्रा इस फ़िल्म की जान हैं, उनके ज़बान से मक्खन की तरह फिसलते डायलॉग आपको मंत्रमुग्ध कर देंगे। फंडू का पात्र निभा रहे अभिषेक चौहान ने भी फ्रस्टेटेड इंजीनियर का किरदार अच्छा निभाया है, बोनी के किरदार में राघव जुयाल,फ्रेश एक्टिंग करते दिखे हैं, लेकिन लीड करैक्टर होने की अपेक्षा के हिसाब का अभिनय,दोनों एक्टर्स में नहीं मिलता है। पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में निधि सिंह ने कमाल का काम कर दर्शकों को चोंकया है। राम कपूर ने “लवली सिंह” का किरदार निभाया है, स्क्रीन टाइमिंग कम होने के बाद भी उनकी परफॉर्मन्स याद रखने लायक है। छोटे करैक्टर में दुर्गेश सिंह,जिन्होंने ‘ पाब्लो यादव’ का किरदार निभाया है, ने बहुत ही मज़ेदार अभिनय किया है, जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं, ठहाके गारन्टी हैं। इनके अलावा सभी कलाकारों ने अपने स्पेस में बेहतरिन अभिनय किया है।

(अभिषेक चौहान और राघव जुयाल)

(निधि सिंह)

       ( राम कपूर)

( दुर्गेश सिंह)

यह फ़िल्म एक तरह का एक्सपेरिमेंटल सिनेमा है, जहाँ हँसी की हल्की डोज़ के साथ साथ आपको मिलेगा आज के राजनीतिक और सामाजिक परिवेश पर कसता तीखा सच्चा तंज, एक अलग तरह का निर्देशन भी देख पाएंगे आप इस फ़िल्म में,जहाँ फ़िल्म की पटकथा और पात्रों के साथ न्याय करते नजर आए है आशीष शुक्ला और इन सभी के साथ संजय मिश्रा का बाकमाल बहता हुआ अभिनय तो है ही है।

तो अगर आप फ़िल्म समीक्षक की तरह देखेंगे तो हो सकता है आपको इस फ़िल्म में कुछ कमियाँ नज़र आएं लेकिन फ़िल्म प्रसंशक के रूप से एक अलग, सच्चे और मज़ेदार सिनेमा की झलक आपको इस फ़िल्म में दिखाई देगी। ऐसा एक्सपेरिमेंटल सिनेमा आज कल के परिवेश में सराहा ही जाना चाहिए।


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