अष्टभुजा शुक्ल से बातचीत के कुछ ख़ास हिस्से

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अष्टभुजा शुक्ल से बातचीत के कुछ ख़ास हिस्से

(सौरभ पाण्डेय की डायरी से)

 

पीठ पर कैमरे का एक बस्ता लादे मेरे साथी बाइक पर पीछे बैठे थे। हम चिलचिलाती धूप में घर (गोरखपुर) से निकले और लगभग डेढ़ घंटे के भीतर हम अष्टभुजा जी के नए आवास के करीब पहुंच गए । उनका नया आवास बस्ती सदर अस्पताल से कुछ दूरी पर है।

हमने उन्हें फोन किया कि ‘सर हम आस पास ही खड़े हैं’ , तो उन्होने हमें बारीकी से समझाया की हम उनके घर तक कैसे पहुंच सकते हैं।
ओला, ऊबर और जीपीएस के इस ज़माने में जब कोई आपको इतने इत्मीनान से रास्ता समझाए तो आपके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिंच आती है। हम इसी मुस्कान और अपने पन के साथ आगे बढ़े।

हम जिस मोड़ से अंदर की तरफ़ मुड़े थे, उस मोड़ पर लिखा था “आचार्य रामचंद्र शुक्ल नगर”। रामचंद्र शुक्ल बस्ती से तो थे लेकिन उनकी बस्ती अभी यहाँ से काफी दूर थी। ये बात मुझे हैरानी और खुशी दोनों दे रही थी कि-अष्टभुजा जी जहाँ रहते हैं उस जगह का नाम उनके प्रिय लेखक के नाम पर है। मैं यही सोचने लगा कि क्या कभी मैं भी जहां रहूंगा उस जगह का नाम निर्मल वर्मा या कामू या बलदेव वैद या सैमुअल बैकेट के नाम पर हो पाएगा ?

इसी खूबसूरत खयाल के साथ मैं हम जैसे ही आगे बढ़े, सफेद कुर्ते में अष्टभुजा जी अपने घर से थोड़ा पहले ही खड़े मिले। वो आगे आकर हम लोगों की राह देख रहे थे। उन्हें इस तरह देख कर लगा कि जैसे मैं बरसों बाद अपने गांव आया हूं और मेरे दादा जी रास्ते पर खड़े अपने पोते की राह देख रहे हैं।

 

अष्टभुजा जी का ये मकान 2 वर्ष पुराना है, और अभी ऊपर दूसरे तल्ले का निर्माण कार्य जारी है। उनके घर के सामने दूर दूर तक खाली जमीनें थी। एक दो गेहूं के खेतों में सुनहली बालियां लटक रही थी जिसे देखते ही मुझे उनकी कविता “चैत के बादल” की याद आ गई जो हमने बाद में उनसे सुनी भी। खाली जमीनों पर ढेर सारे छुट्टा पशु( गाय और सांड) आराम से बैठे हुए जुगालियां कर रहे थे । वो सरकार की सारी गौ संरक्षण नीतियों को पचा रहे थे।

 

अष्टभुजा जी ने हमें एक हल्के दुःख के साथ कई बार कहा कि इससे पहले वो करीब साठ वर्षों तक अपने गांव के जिस घर में रहें, आज उसमें ताला लगा हुआ है। फिर गांव छोड़ने के कारण में वो बताने लगे की अभी भी उनके घर तक पहुँचने के लिए कोई ढंग का रास्ता नहीं है।

 

जो दूसरा कारण उन्होंने बताया उसने मेरा काफी ज्यादा ध्यान खिंचा। उन्होंने बताया की आज के दौर में हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में एक जहरीली आधुनिकता फ़ैल गयी जिसमें सांस लेने के लिए आपको भी मरणासन्न होना पड़ेगा।

 

एक स्वस्थ अभिवादन के बाद वो हमें अपने घर के अंदर ले गए। अपनी पत्नी का नाम पुकारने से बचते हुए वो “हो” या अपने पोते (बाबू) का नाम पुकार रहे थे ।
उनकी पत्नी बड़े स्नेह के साथ हमारे लिए गुझिया और चाय लेकर आईं ।

 

अष्टभुजा जी हमारे सामने बैठे कभी चुप चाप हमें देखते तो कभी कुछ पूछ लेते ।
थोड़ी देर ढिबरी और अपने बारे में बताने के बाद मैंने उनकी कविताओं और गद्य पे बात करने की शुरुआत की। मैंने उन्हे बताया कि उनकी कविताएं मुझे कितनी प्रिय हैं।

 

अपने तंबाकू की डिबिया से तंबाकू को हथेली पर रख कर अंगूठे से उसे मसलते हुए उन्होंने मुझसे पूछा – “पीते हो?”

 

बात चीत का सिलसिला शुरू हुआ और कुछ बातें जिसने मुझे थोड़ी देर सोचने को विवश किया वो मैं यहां लिख रहा हूं

पूरी वार्ता का वीडियो जल्द ही “द ढिबरी” के यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज पर उपलब्ध होगा।

 

ख़ास बातें

 

1) “साहित्य में हमने इतनी ज्यादा मनुष्यता को घुसा दिया कि हमें मनुष्यों के कष्ट और संवेदनाओं के अतिरिक्त, और कुछ नही सूझता ।”

हमें पता है की हम इस पारिस्थितिकी के सिर्फ एक हिस्से हैं, और हमारा अस्तित्व तभी तक है जब तक इस पारिस्थितिकी तंत्र के और भी हिस्से सलामत रहेंगे।
हमें अपने साहित्य को प्रगाढ़ करने के लिए और अवयवों को भी साहित्य में जगह देनी होगी ।
अगर उनकी बात के लिए एक उदाहरण ढूंढे तो हमें महादेवी जी की गिल्लू और सोना जैसे संस्मरण याद आयेंगे। जिसमे महादेवी जी ने मनुष्यता से इतर पशुओं की संवेदनाओं से पाठकों को जोड़ने का प्रयास किया है।
अपनी इसी बात के पक्ष में अष्टभुजा जी ने वाल्मीकि का उदाहरण लिया – “हमें ये नही भूलना चाहिए कि हमारे आदिकवि वाल्मीकि के मुख से पहली कविता क्रौंच जोड़े के वियोग को देख कर ही फूंटी थी ।

 

2) दूसरी बात में उन्होंने ये विश्वास दिलाया कि साहित्यिक घरानों की वजह से साहित्य कभी प्रभावित नहीं होगा। चाहे कोई कितना ही खुद को प्रबुद्ध कहकर, उस घराने माध्यम से साहित्य को कंट्रोल चाहे ।

 

3) “संस्थापना का दुख विस्थापन के दुख से कहीं ज्यादा होता है।”

इस बात के पक्ष में उन्होंने उन विस्थापित लेखकों के दुखों को खारिज किया जो अपने मर्जी या धनोपर्जन के लिए कहीं और गये, फिर विस्थापन के दुखों से साहित्य को भर दिया । उन्होने कहा कि अगर आप को विस्थापन का दुख लेखक में देखना है तो आप रुश्दी की जगह कुंदेरा को पढ़ें।

 

4) “हम आधुनिक होने से पहले ही उत्तर आधुनिकता (पोस्ट मॉर्डन) पर झगड़ा करने लगे”
वो कहते हैं कि वैश्विकता की लहर में हमारा अपना मौलिक साहित्य जिसे वैश्विक होना था, वो बीमार पड़ गया, और हम उसकी देख भाल की जगह आधुनिक, उत्तर आधुनिक या अब कहें तो उत्तरोत्तर आधुनिकता पे बहस ही करते रह गए।
हम रेणु के साहित्य की समृद्धता को समझने से पहले ही बोर्हेस की जटिलता पर वाह करने लगे ।

 

संस्मरण

 

आखिरी में वो दिल्ली के कई लेखकों और आलोचकों के विषय में बातचीत करते रहें जिसमें उन्होंने मुख्य रूप से अविनाश मिश्र, देवीप्रसाद मिश्र, वागीश शुक्ला को इस वक्त के अपने प्रिय साहित्यकारों की सूची में रखते हुए इन तीनों के बारें में बातें की।

देवीप्रसाद मिश्र पे एक संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने बताया कि उनकी नामवार जी से जान पहचान में किस तरह से देवीप्रसाद मिश्र की कविता “प्रार्थना के शिल्प में नहीं” काम आई थी ।

 

“वो बताते हैं कि उनकी दूसरी कविता संग्रह “पद कुपद” को एक इलाहाबाद की पत्रिका ने पूरा छाप दिया था, और उसके बाद वो किसी तरह से नामवार जी तक पहुंच गई। नामवार जी ने किसी समारोह में उस किताब पर 10 मिन तक भाषण दिया, जो उनके लेखन का टर्निग प्वाइंट साबित हुआ । उसके बाद ही साहित्य में उअष्टभुजा जी को पहचान मिलनी शुरू हुई।”

 

लेकिन बात देवी प्रसाद मिश्र की थी इस लिए उन्होंने इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वो किताब और खुद की प्रशंसा के बाद भी नामवार जी से मिल नही पाए थे ।
एक रोज उसी पत्रिका के संपादक ने उन्हें अहमदाबाद चलने को कहा जहां नामवार जी भी आ रहे थे । और वो तुरंत तैयार होकर अहमदाबाद चले गए । वहां किसी गुजराती कवि के घर बैठक में सारे धुरंधर लोग जमा थे, और नामवार जी भी वहीं बैठे हुए थे।

उस साल के “भारत भूषण अग्रवाल” सम्मान के लिए “देवी प्रसाद मिश्र” का नाम नामवार जी ने दिया था, क्योंकि वह उस साल उस सम्मान के वितरण प्रक्रिया में निर्णायक थे । उन्होंने देवी प्रसाद मिश्र की कविता “प्रार्थना के शिल्प में नहीं” के लिए उन्हें भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित किया था।
उस कविता को सुनने और सुनाने के बाद नामवर सिंह जी ने सबसे कहा कि देखिए कविता कितनी खूबसूरत है। सब लोग कविता सुनकर तारीफ करने लगें । लेकिन अष्टभुजा जी को कविता में कुछ अटपटा सा लगा – वो बताते हैं कि वो एक कोने में खड़े वो सबको सुन रहे थे ।
वो कविता माइथोलॉजी पर आधारित थी। अष्टभुजा जी ने बोला कि इस कविता में एक पंक्ति में कवि देवों को इस दुनिया से चले जाने की बात कर रहा है लेकिन उसमे दैत्यों के जाने की बात कहीं नही कही गई है ।
इसी बात को बड़ी मुखरता से बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि, “क्या हम ऐसी सभ्यता की कल्पना करते हैं जिसमें दैत्य शेष रह जाए?”

 

इस बात पर नामवार जी काफी देर तक चुप रहे और फिर मजाकिया लहजे में कहा की “ये तो बिलकुल ऐसा ही हो गया, कि एक बार एक पत्रिका में निराला जी की एक अर्धनग्न तस्वीर के साथ उनकी एक कविता छपी थी और ऊपर लिखा था की शेष भाग अगले अंक में।”
सब जोर से हंस पड़े और इस प्रकार नामवार सिंह से अष्टभुजा जी की मित्रता हो गई।


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