“अंधी लाठी”

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मेरे पास के मकान में क़रीब अट्ठावन वर्ष की एक महिला रहती थीं। चूंकि मेरे ही गाँव की रहने वाली थीं तो उन्हें सब बुआ कहते थे। हम भी सबकी देखा देख उनसे बुआ कहने लगे। बुआ को बचपन से हमने अकेला ही देखा। उनके कोई बच्चा नहीं था। सब ऐसा भी कहते थे कि उनके पति बुआ को करीब 22 वर्ष की उम्र में छोड़ कर किसी दूसरी लड़की से ब्याह कर दिल्ली चले गए थे। बुआ बहुत ग़रीब परिवार से थीं। मतलब उनकी माँ किसी बड़े सेठ के यहाँ काम किया करती थीं।

जैसे तैसे बुआ को उनकी माँ ने बी ए कराई और उसके बाद अपने सेठ से कह कर बुआ का दाखिला बी एड कॉलेज में करा दिया था। बी एड करते ही बुआ एक सरकारी विद्यालय में हिंदी की वरिष्ठ अध्यापिका के रूप में नियुक्त हो गयीं। फिर वे और उनकी माँ एक किराए के मकान में रहने लगे। आर्थिक तंगी ने ढील दी ही थी कि क़रीब दो साल बाद बुआ की माँ ने लंबे समय से बीमारी के कारण अपना शरीर छोड़ दिया। बुआ बिल्कुल अकेली हो गयी थीं।

ख़ाली मकान में अकेलापन तो और दुगना हो जाता है! सो बुआ वहाँ से मकान खाली कर हमारे बगल वाले मकान में आ गईं और तब से यहीं है। ये सारी कहानी एक रोज़ मेरी दादी ने मुझे सुनाई। मैंने उनकी इस बात को इतनी गम्भीरता से नहीं लिया पर एक रोज़ बहन को पढ़ाते वक़्त माँ ने बाल विवाह का ज़िक्र किया तो उदाहरण के रूप में बुआ को प्रस्तुत किया और बोलीं “बुआ की शादी महज़ 12 वर्ष में ही करा दी गयी थी, बाल विवाह कानूनी अपराध है। तुझे पता है बिट्टो!

इक्कीस रो छोरो अठारह री छोरी
बांधों तभी ब्याह री डोरी”
बात काटते हुए मैं तुरन्त बोल पड़ा। “अच्छा माँ बुआ के पति कितने साल के थे?” माँ मायूसी के स्वर में बोली “बेटा बेमेल ब्याह हुआ था; वे 25 साल के थे उस वक़्त! मैं  क्या ही बोलता, मैं वहाँ से फौरन चला गया पर उसके बाद जब भी बुआ को देखता तो पता नहीं मुझे बहुत बुरा लगता।

बुआ हर वक़्त हँसी ठिठोली किया करती। बुआ के चेहरे पर मैंने कभी शिकन नहीं देखी। कभी दुख नहीं देखा जाने किस क़ब्र में छुपा रखा था! मैंने बुआ का हमेशा मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा। मैं जान ही नहीं पाया उस मुस्कुराहट के पीछे का दर्द! एक लम्बी उम्र बुआ ने नकाब में बिता दी और बिता रही थी।

उसके यहाँ मोहल्ले के सभी बच्चे खेलने आ जाते थे। चूंकि बुआ हिंदी की अध्यापिका थी और साथ ही पढने की शौकीन भी तो वो हमें जैनेन्द्र कुमार के “त्यागपत्र” की कहानी सुनाया करती। हम सब बड़े ही इत्मिनान से बुआ को सुनते। बुआ को सुनना अत्यंत कर्णप्रिय था।

मेरी बारहवीं की परीक्षा हुई ही थीं और गर्मियों की छुट्टियाँ पड़ गईं थीं तो दिन भर बुआ के यहाँ रहता। चूंकि हमारे यहाँ कूलर नहीं था तो मैं बुआ के यहाँ अपनी दोपहरी काटने अक्सर चला जाया करता। बुआ या तो ओशो को सुनती रहतीं या महादेवी को पढ़तीं या बोर्ड की कापियाँ जांचती। बुआ जानती थीं कि मुझे कविताएँ कहानियाँ, उपन्यास ये सब पढ़ना बहुत पसंद है।

मैं अक्सर बुआ की शेल्फ को खंगालता रहता और बुआ भी मुझे कुछ कुछ सुनाती रहतीं। कुल मिलाकर मेरा मन पूरी तरीके से वहीं लगा रहता। एक रोज़ मैं बुआ के यहाँ गया तो बुआ दसवीं बोर्ड की हिंदी की कापियाँ जाँच रही थीं। मेरे जाते ही बुआ बोली “बेटे एक प्रश्न है इसमें; करुण रस का उदाहरण लिखो। और बच्चों ने कितनी बढ़िया बढ़िया पंक्तियाँ लिखीं हैं। सुनेगा?”
बड़ी ही उत्साह से मैं बोला “हाँ बुआ सुनाओ”

गूगल से साभार

नाक पर चश्मा लगा के कॉपी की तरफ नज़रे गड़ाकर बुआ एक एक कर सबके उत्तर पढ़ने लगीं। किसी ने माथुर की छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन” यह लिखी। किसी ने महादेवी की “ये नीर भरी दुख की बदली” यह पंक्ति लिखी। किसी ने मीरा के पद लिखे। किसी ने दिनकर की “मज़दूर” कविता की पंक्तियाँ लिखीं। किसी किसी बच्चे ने तो अपनी ही लिखी पंक्तियाँ लिखीं। यह देखकर बुआ बहुत ख़ुश हुई।

बुआ मुझे सुनाती जा रही थीं। मैं बहुत ध्यान लगा कर बुआ को सुनता जा रहा था। अचानक बुआ की नज़र एक कॉपी पर अटक गयी वह किसी लड़की की कॉपी थी। उसका उत्तर पढ़ बुआ पसीना पसीना हो गयीं शायद बुआ का बीपी हाई हो गया था। बुआ एक दम बेचैन हो गईं। मैं घबरा गया था। बुआ ने नाक से चश्मा हटाया पैन ज़मीन पर रखा और कापी साइड में रख फ़ौरन दूसरे कमरे में चली गयीं। मैं भौंचक्का रह गया।

आख़िर हुआ क्या है? बुआ के जाने के बाद मैंने कॉपी उठाई और उत्तर देखा तो उस लड़की ने “करुण रस का उदाहरण लिखो!” इस प्रश्न का उत्तर बिगड़े ख़त में लिखा हुआ था ” बाल विवाह”।


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One thought on ““अंधी लाठी”

  • August 9, 2020 at 6:33 am
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    deep concept

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