पॉलिटिकल एंटरटेनमेंट से भरपूर एक डॉक्यूमेंट्री जो भारतीय सिनेमाघरों में सबसे ज्यादा दिन तक चलने वाली डॉक्यूमेंट्री फिल्म है..

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An insignificant man: डॉक्यूमेंट्री या एंटरटेनमेंट

 

 

2013 के जन लोकपाल बिल के खिलाफ आंदोलन कर रहे कुछ लोग। जो साकार से लगातार लोकपाल बिल लाने के लिए अनशन कर रहे थे, आंदोलन कर रहे थे । उन्हीं लोगों में से कुछ ने जब सरकार का उदासीन रवैया देखा , तो उन्होंने तय किया कि आंदोलन से बेहतर है कि अब मैदान में उतर कर अपनी बात की जाए । यानी वे लोग राजनीति में आकर सरकार की आंख से आंख मिलाकर अपनी बात कहने को तैयार हुए।  

 

अन्ना के साथ ‘आप’

 

 

ये लोग थे अन्ना आंदोलन से निकले हुए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता और मुखिया । मुखिया के लिए एक नाम जो उस दौरान मीडिया में भी खूब छाया था। वो अपनी ए ग्रेड सरकारी जॉब छोड़ कर आंदोलन करने वाले। दुबले कद काठी के अरविंद केजरीवाल थे । जिनके हौसले पत्थर हो गए थे। चाहे उन पर स्याही फेंकी गई  या उन पर हमला किया गया हो।

 

सेंसरशिप और रिलीज

एन इंसिग्निफिकेंट मैन एक डॉक्यूमंट्री लगती तो है मगर आप उसे इत्मीनान से देखने बैठते हैं, तो आप पाएंगे की ये फिल्म जिस तरह से बनाई गई है वो एक डॉक्यूमेंट्री से कहीं ज्यादा है । फ़िल्म जब बनकर तैयार हुई तो सीबीएफसी ने इस फिल्म पे रोक लगा दी । निर्देशकों से कहा गया कि आप इसमें से कोंग्रेस और बीजेपी का नाम हटा दीजिए या प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से एनओसी लेकर आइए ।

 

निर्देशकों ने ना तो नाम हटाया, ना ही कोई एनओसी लिया । उन्होने सीबीएफसी के इस निर्णय के खिलाफ अपील दायर करी और आगे चलकर फैसला उनके पक्ष में आया ।

 

बाद में ये फिल्म 17 नवंबर 2017 को इंडिया में रिलीज़ हुई।

 ये फिल्म जब इंडिया में रिलीज़ हुई तो करीब 8 हफ्ते तक सिनेमाघरों में चली । जो आज तक की सबसे ज्यादा दिनों तक सिनेमाघरों में चलने वाली इंडियन डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म है।

 

1600 घंटे के वीडियो से करीब दो घंटे की फिल्म बनाना ये दिखता है कि फिल्ममेकर  बखूबी से अपना विजन और सिनेमा दोनो को एक साथ लाने में सफल हुए है।

फ़िल्म की एडिटिंग अनुभव त्यागी और मनन भट्ट ने की है।

फ़िल्म के असली किरदार

 

अगर एन इंसिग्निफिकेंट मैन को एक फिल्म माने। तो फिल्म के लीड में आप अरविंद केजरीवाल और योगेन्द्र यादव को देखेंगे। आज योगेन्द्र यादव को आम आदमी पार्टी से अलग देखने के बाद आप ये शायद ही माने कि ‘आप’ को सत्ता में लाने में योगेन्द्र यादव का रोल अरविन्द केजरीवाल से भी बढ़कर है। 

 

फ़िल्म दिखाती है कि किस तरह से योगेन्द्र और मनीष सिसोदिया ने जमीनी स्तर पर दिल्ली के घर घर जाकर आम आदमी पार्टी की पैठ मजबूत की । फ़िल्म देख कर ये साफ लगता है कि यही एक कारण रहा होगा कि पहले ही चुनाव में आप ने 27 सीटें जीती और कोंग्रेस को दिल्ली से उखाड़ दिया।

 

फ़िल्म में दिल्ली चुनाव में आप के  टिकट बांटने से लेकर एक कैंडिडेट(संतोष कोली) की हत्या तक को दिखाया गया है।

 

डायरेक्टर्स विजन

फ़िल्म के डायरेक्टर्स खुशबू रांका और विनय शुक्ला एक इंटरवयू में बताते हैं कि उन्होंने ये सोच कर ये फिल्म नहीं बनाई थी कि आम आदमी पार्टी सरकार बनाएगी । वो बताते हैं की हमारा लक्ष्य था दिल्ली चुनाव को किसी एक पार्टी के नजर से कवर करना।

 इसके लिए उन्होंने सबसे पहले बीजेपी को कॉन्टेक्ट किया था। लेकिन बीजेपी ने उन्हें साफ मना कर दिया । जब उन्होंने अरविन्द से बात करी तो अरविन्द ने उन्हें इसी शर्त पर हां किया कि “आप जैसे चाहे शूट कीजिए लेकिन न आप हमें डिस्टर्ब करेंगे न हम आपको।”

फ़िल्म देख कर लगेगा की अरविन्द का ये काफी ब्रेव डिसीजन था।

 

फ़िल्म के प्रोड्यूसर में एक नाम आनंद गांधी का भी आता है, जो अपने एक्सपेरिमेंटल सिनेमा के लिए जाने जाते हैं। फ़िल्म के सह निदेशक विनय शुक्ला को आपने द शिप ऑफ थीसिस में एक्टिंग करते हुए देखा होगा । फ़िल्म में उनके किरदार का नाम था चार्वाक जो जैन साधु से कई फिलोसॉफिकल मुद्दों पर बात करता है।

 

टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में इस फिल्म ने सभी दर्शकों को उनकी कुर्सी से उठने को मजबूर कर दिया । वहां इस फिल्म ने स्टैंडिंग ओवेशन मिला। फ़िल्म को हफिंगटन पोस्ट ने दुनिया की बेहतरीन 12 पॉलिटिकल डॉक्यूमेंट्री  में जगह दी है।


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