इलाहाबाद ब्लूज: दास्तां-ए-इलाहाबाद

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 दास्तां-ए-इलाहाबाद

 

इलाहाबाद जो एक समय आईएएस और पीसीएस के लिए खूब जाना जाता था।विश्वविद्यालय एक धरोहर के रूप में, जो पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था।इलाहाबाद ब्लूज अंजनी कुमार पांडे सर की किताब है, जो अभी गुजरात में आईआरएस ऑफिसर हैं।

इलाहाबाद क्या है?

इलाहाबाद संघर्षों का साथी है।जो नए नए बारहवीं पास लड़के इलाहाबाद में आंखों में सपने लिए और कंधे पर बैग,और एक हाथ में राशन का झोला लिए आते हैं।
इलाहाबाद सबको अपनाता है।

इलाहाबाद की ज़िंदगी भी ग़ज़ब है।यहां चौराहों पर चाय की दुकानों पर होती राजनीति पर बहसें। इलाहाबाद बनारस से तेज है, लेकिन इसकी अपनी एक सुस्ती है, जो हनुमान जी जैसे कर्मठी व्यक्ति को भी लेटने के लिए मजबूर कर देती है। इलाहाबाद मंदिरों ख़ास तौर से आदि देव शंकर और भगवान हनुमान के मंदिरों से परिपूर्ण हैं।

सिविल लाइन अपने आप में अद्भुत है।इसे अंग्रेज़ों ने अपने दौर में रहने के लिए बनाया था। धर्मवीर भारती गुनाहों का देवता में लिखते हैं कि “इलाहाबाद का नगर देवता जरूर कोई रोमांटिक कलाकार रहा है।ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट, गठन,ज़िंदगी और रहन सहन में कोई बंधे बंधाए नियम नहीं, कहीं कोई कसाव नहीं, हर जगह एक स्वच्छंद खुलाव, एक बिखरी सी अनियमितता।बनारस की गलियों से पतली गालियां और लखनऊ से चौड़ी सड़कें।यार्कशायर और ब्राइटन के उपनगरों से मुकाबला करने वाला सिविल लाइन और दलदलों की मात देने वाली गालियां……”

संगम को क्या लिखा जाए, संगम जहां दो लगभग समानांतर नदियां मिल जाती हैं ठीक वैसे इलाहाबाद में दो समानांतर विरोधी विचार मिलकर संगम हो जाते हैं।
झूंसी में पुल से यह दिखाता है, जब बांस में भगवा ध्वज लेकर जब बड़े हनुमान जी के यहां लोग जाते हैं लगता है कोई मेला जा रहा है।आस्था का अनूठा रंग संगम और कुंभ के पास है।


कुंभ में वह भीड़ नहीं होती बल्कि आस्थाओं का संगम होता है, जो अभूतपूर्व है।गर्व है कि इसे यूनेस्को ने विरासत का हिस्सा बनाया।
खुसरो बाग़ जाकर जो कलाकारी दिखती है वह ग़ज़ब ही है।आनंद भवन जाइए स्वतंत्रता का अवशेष देखने को मिलेगा।बस इतना सोचिए कि यहीं स्वतंत्र पार्टी बनी थी, यहीं महात्मा गांधी बैठ कर विचार करते होंगे।बस इतना सोच कर आपकी आंख भर आएगी।

कंपनी गार्डन जाना, वहां आजाद की प्रतिमा देखना आपको रोमांचित करेगा, और आपके अंदर की हिम्मत कांप जाए, जब एक जवान खुद के माथे पर इन्कलाब लिखकर खुद पर गोली चला ले।

इलाहाबाद अपने कचौरी के दुकानों पर मिलने वाली आलू की सब्ज़ी और रायते के स्वाद के कारण जुबां पर रहता है।आप किसी भी चौराहे पर हों,वहां आपको कचौरी का ठेला जरूर मिलेगा।

इलाहाबाद बिखरा हुआ शहर है।यह चुंगी से बघाड़ा तक, अल्लापुर से रामबाग तक,सिविल लाइन से तेलियरगंज तक, सुलेमसराय से मम्फोर्डगंज तक बहुत खूबसूरत है।यूनिवर्सिटी से कटरा तक का अलग स्वैग है।

इलाहाबाद में रसूलाबाद घाट के पास महादेवी वर्मा जी रहा करती थीं, उनका घर अब भी वहीं है।वहां निराला जी, फिराक गोरखपुरी साहब,जैसे बड़े और उच्च कोटि के साहित्यकार हुए हैं।

विश्वविद्यालय से प्रधानमंत्री से लेकर ब्यूरोक्रेट्स तक निकले हैं।इलाहाबाद को हमेशा इसका गर्व है लेकिन घमंड नहीं है, क्योंकि शहर बहुत सालिन है।
इलाहाबाद और प्रयागराज में कोई अंतर नहीं है,प्रयाग ने अभी इलाहाबादपना खोया नहीं है।और आप यह किताब पढ़ने के बाद इलाहाबाद के बारे में और जान पाएंगे।

 इलाहाबाद ब्लूज क्या है?

यह किताब अंजनी सर ने अपने सफ़र के बारे में लिखा है।इसमें एक बड़ा हिस्सा उनके सफ़र के बारे में है, आप प्रतापगढ़ से रसूलाबाद तक सब देख लेंगे।इसमें उनका स्कूल टाइम, कॉलेज टाइम साथ ही इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का सफर सब कैद है।

इसमें इलाहाबाद से प्रयाग तक सफर भी दिखेगा।इलाहाबाद बीस सालों में कैसे बदला, वह आप देख पाएंगे।
लेकिन जो सबसे बेहतरीन हिस्सा है,वह यह कि इसमें आप अवध को खोज पाएंगे।यह संस्कृति के अनेक तत्वों को नई पीढ़ी तक ले जानी किताब है।उन्होंने कुछ हिस्से अपनी माता जी के हवाले से लिखा है, जिसमें उनकी मां और पचास साल पहले जाकर अवधी संस्कृति का वर्णन करती है।


यह किताब एक आईआरएस की कहानी जरूर है, लेकिन अवध, जिसमें अद्भुत मिश्रण है। उन सब का वर्णन लेखक करते हैं।
किताब के बारे में और बहुत कुछ लिखा जा सकता है, लेकिन लिखना पाठक और लेखक दोनों के साथ नाइंसाफी होगी।

एक शब्द में यह किताब इलाहाबाद में हुए परिवर्तन पर आधारित है।इलाहाबाद की जिंदगी पर आधारित है।यह ख़ालिस इलाहाबाद है।
आप जरूर पढ़ें, इसे पढ़ने के बाद आप निराश नहीं होंगे…..

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लेख – आनंद राज सिंह


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One thought on “इलाहाबाद ब्लूज: दास्तां-ए-इलाहाबाद

  • August 29, 2020 at 7:41 am
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    बहुत अच्छी समीक्षा की गई है।????

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