वर्जीनिया वुल्फ के ” रुम ऑफ वन्स ओन ” के बहाने साहित्य में स्त्री की पड़ताल

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कमरे की तलाश जारी है…

 

वर्जीनिया वुल्फ के “ रुम ऑफ वन्स ओन ” के बहाने साहित्य में स्त्री की पड़ताल

 

आप चाहें तो अपने पुस्तकालयों में ताले डाल दें, लेकिन मेरे दिमाग की आज़ादी पर पाबंदी लगाने के लिए न कोई दरवाज़ा, न ताला है और न ही कोई कुंडी।

बीसवीं सदी की बेहतरीन साहित्यकार वर्जीनिया वुल्फ ने जब ये कहा था, वे एक कमरे की कल्पना कर रहीं थी। अपने कमरे की। स्त्री के कमरे की। कमरे के बहाने वे साहित्य जगत में स्त्री के स्थान को खोज़ रही थी। इस खोज़ में उन्हें साहित्य लेखन के हाशिए पर घिसटती हुई औरत मिली। जबकि साहित्य लेखन के धुरंधर पुरुष अपनी कल्पनाशीलता में उन्हें अपने हिसाब से परिभाषित कर रहे थे। गोया कि वो इंसान नहीं सिर्फ औरत थीं। उनका हिसाब उनकी मर्दानगी और सामाजिक स्थिति ने तय किया था।

 

वर्जीनिया कहती हैं कि-

साहित्य लेखन बौद्धिक आज़ादी पर निर्भर है। बौद्धिक आज़ादी भौतिक चीजों पर। भौतिक चीजों का बटवारा हमेशा ही लिंग आधारित रहा है, जहां स्त्री गरीब है। गरीब भी आज से नहीं सदियों से।

स्त्री की इस साहित्यिक जन्मजात गरीबी का असर देखने की फिराक़ में वुल्फ पुस्तकालयों में भटकती हैं। और इस ख्याल से ही डर  जाती हैं कि अगर उन्हें यहां भी उनके सवालों के जवाब न मिले तो वो कहां जाएंगी। कहां खोजेंगी अपना सच। अपने पीड़ादायी सफर में उन्होंने स्त्री को देह का पर्याय हो जाते देखा। और देह को सेक्स का केंद्र। इस विषय में हर उस पुरुष को रुचि थी जो स्त्री नहीं था। फिर स्त्री का सच था क्या। जाहिर है जो लिखा ही नहीं गया। या लिखने नहीं दिया गया।

स्त्री को अपने कल्पना जगत के बाहर न देख पाने वाले वर्जीनिया वुल्फ की किताब द रुम ऑफ वन्स ओन पढ़ते वक्त उनके स्त्री के लिए कमरे की पैरवी को पढ़ाई-लिखाई की आज़ादी से जोड़कर देख लेते हैं।

वर्जिनिया वुल्फ का कमरा

जबकि अपनी किताब में वे बार-बार कह रही हैं। औरत को अगर साहित्य लेखन करना है तो उसे पैसा और एक कमरा हर हाल में चाहिए । यहां कमरे का मतलब सबसे पहले सिर्फ कमरा ही है। अपना कमरा। जैसे अपना टूथब्रश होता है। उतना ही अपना। जिस कमरे में सामान को रखने से लेकर बत्ती के जलने और बुझने का नियंत्रण आप के हाथ में हो। जो कमरा इतना आपका हो कि वहां लोग खटखटा कर आना पसंद करें।

विचार पदार्थ का विकसित रुप है-मार्क्स 

साहित्यिक गरीबी की शिकार औरत इस पुरुषवादी व्यवस्था में मानसिक गुलामी की शिकार है। वो ख़ुद भी कई बार अपने कमरे की संकल्पना घर के रसोईघर या पूजाघर के तौर पर करती है। या अपनी ही पंक्ति में खड़े अपने तथाकथित प्रगतिशील पुरुष साथी की तरह उनका मतलब भी अपने कमरे से अपने लिए लेखन की आज़ादी से ही होता है। ये वैसा ही है जैसे आपको बिना दांत भुट्टा खाने दिया जाए। आप निगल तो सकते हैं, खा नहीं सकते।

इस लिहाज़ से उन्नीसवी सदी में कार्ल मार्क्स अपनी द्वंदात्मक भौतिकवाद की व्याख्या में पहले ही कह चुका था कि विचार पदार्थ का विकसित रुप है। हालांकि वे भी पदार्थ, वस्तु या भौतिक चीजों के लिंग के अनुसार गैरबराबरी आधारित बटंवारे पर मौन रह गए। जिस पर बाद में बीसवी सदी की नारीवादी आलोचकों हेडी हार्टमैन और नैन्सी फ्ररासर ने बखूबी सवाल खड़े किए। खैर! ये एक अलग बहस है। यहां बात कमरे की हो रही थी। जिसकी वक़ालत वर्जीनिया कर रही थी।

 

स्त्रियों पर ढ़ेरों किताबें थीं जो पुरुषों  ने लिखी ..

अपनी सिर पटक कोशिश में उन्होंने पाया कि स्त्रियों पर ढ़ेरों किताबें थीं जो उन पुरुषों ने लिखी थी जो ये मानते थे कि “अक्लमंद पुरुष यह कभी नहीं बताते की वे स्त्रियों के बारें में क्या सोचते हैं।“ दरअसल ये सारे अक्लमंद पुरुष ही थे, जिन्हें उनके पुरुष साथी ही अक्लमंद कह रहे थे। उनकी अक्लमंदी पर उनकी अक्ल नहीं मर्दानगी से उपजी मंदी का असर था।

इस उहापोह से बेचैन वुल्फ अचानक और परेशान हो जाती है। उन्हें लगा कि इतनी किताबें औरतों पर पढ़ लेने के बाद उन्हें उनके पुरुष साथियों की तरह किसी निष्कर्ष पर आ जाना चाहिए था। लेकिन वो तो द मेंटल, मॉरल एंड फिजिकल इंफीरियारिटी ऑफ द फीमेल सेक्स  लिख रही वॉन एक्स  की तस्वीर बना रहीं थी।

वे शेक्सपीयर की बहन जुडिथ के चरित्र को मज़बूती से गढ़ती है और कहती हैं कि उनके विषय में कभी भी एक शब्द नहीं लिखा गया सिवाय इसके कि वे शेक्सपीयर की बहन थी। लेकिन वे हम सबमें हैं। हर औरत में है जो सिर्फ इसलिए साहित्य सर्जन नहीं कर पा रही क्योंकि वो या तो बर्तन धो रही है, या अपने बच्चों को सुला रही है।

 

आज भी कुछ बदला नहीं है

देखा जाए तो आज भी कुछ बदला नहीं है। बड़े मंचों, पुरस्कारों पर पुरुषों का कब्जा है, बिल्कुल वैसे ही जैसे उनका कब्ज़ा होता है घर के ड्रांइग रुम से पान की दुकान तक। ये आज़ादी उन्हें उनकी परवरिश से मिली और ठसक पैतृक संपत्ति पर अधिकार से। महिला दोनों से वंचित है। सोमालिया की प्रखर लेखिका अयान हिरसी अली कहती हैं-

तुम एक स्त्री हो तो तुम एक ज्यादा आज़ाद और स्वावलंबी जीवन जी सकती हो अगर तुम्हारे पास अपना पैसा है। तुम जीवन के बाकी दुःखों से मुक्ति तो नहीं पा सकतीं, लेकिन उनसे ज्यादा आत्म सम्मान और आत्म विश्वास से लड़ सकती हो, अगर तुम आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर हो।

इस आत्मनिर्भरता के अभाव में स्त्री कमजोर जान पड़ती है, ख़ुद को भी और साहित्यिक गलियारों को भी। उसके ख़िलाफ बेहद मज़ूबत साहत्यिक घेराबंदी हैं। आज भी वो तमाम साहित्य का केंद्र तो है, लेकिन ख़ुद हाशिए पर अपनी साहित्यिक मुफलिसी का मातम मना रही है। बड़े मंचों और बड़े प्रकाशकों से पुरुष स्त्री के बारे में अपनी राय पढ़ लिख रहा है, जिन पर तमाम सम्मान भी दिए जाते रहे हैं। लेकिन साहित्य जगत की चौहद्दी पर बैठी स्त्री अभी भी एक अदद कमरे और आर्थिक आज़ादी की तलाश में है। तकलीफदायक है कि अपनी स्वीकार्यता की फिराक़ में वो कई बार अपने ही ख़िलाफ लिख-पढ़ रही है। जिसकी वज़ह की तलाश उसकी सामाजिक गढ़न से इतर लिखने-पढ़ने की सहूलियत न मिल पाने के सवाल में भी ढूंढनी होगी।

नब्बे के दशक में विश्व एक गांव बन गया, औरत कमीज़-पतलून में मॉल्स में खड़ी सश्क्त नज़र आई। लेकिन ये वो भ्रम था जो भूमंडलीकरण ने एक बार फिर औरत के ख़िलाफ ही गढ़ा था। घर में यही औरत अपना वक्त बच्चों को पालने और पति की कमीज़ स्तरी करने में लगा रही थी, जो वक्त उसके कार्यस्थल से उसे अपने लिए मिलना था।

पितृसत्तात्मक पुस्तकालयों की कुंडी रसोईघर से खटखटा रही है.

इस लिहाज़ से बदलते वक्त के साथ बहुत कुछ बदला नहीं है, वो आज भी नेओमी वुल्फ के ब्यूटी मिथ की नायिका की परिभाषा में बिल्कुल सटीक बैठती है। जो बदलती नहीं, रचती नहीं है, नायक से इतर कलाकार नहीं है सिर्फ कलाकृति मात्र है। नायक की कलाकृति।

औरत का अपना कुछ नहीं होता। औरत का कमरा पति का कमरा होता है। औरत का घर पति का घर होता है। औरत का कोई कमरा नहीं होता। उसके सिर्फ पति और बच्चे होते हैं। साहित्य सजृन की दुनिया में अपनी जगह ढूंढती औरत या तो पुरुषों के सुर में सुर मिला रही है या फिर अपने कमरे की तलाश का रुदन गा रही है। ऐसे में स्त्री की रचनाशीलता, कला, राजनीति और उसके ख़ुद के बारे में उसकी समझ पितृसत्तात्मक पुस्तकालयों की कुंडी रसोईघर से खटखटा रही है।

 

अपर्णा दीक्षित

अपर्णा दीक्षित जामिया मिलिया इस्लामिया के महिला अध्ययन केंद्र में काम करती हैं। वे इसी विषय में एमफिल हैं और वर्तमान में लखनऊ की महिला चिकनकारीगरों के एलीनेशन पर अपनी पीएचडी लिख रही हैं। अपर्णा गाहे-बगाहे हिंदी कविता व कहानियां लिखने की भी कोशिश करती हैं.


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2 thoughts on “वर्जीनिया वुल्फ के ” रुम ऑफ वन्स ओन ” के बहाने साहित्य में स्त्री की पड़ताल

  • March 8, 2021 at 10:42 am
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    It’s a very insightful and amazing article. I am also reading this book but unable to catch few feminist highlights. But here you are bringing up an important perspective of this book. I loved it. One can easily get a glimpse of the difference between women’s and men’s writing in literature. I appreciate you.
    AMAZING…

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  • March 8, 2021 at 11:19 am
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    Very well written.

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