10 अक्टूबर : वर्ल्ड मेन्टल हेल्थ डे

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आए दिन हम कोई न कोई डे मनाते हैं और सरकारें और संगठन उस दिन के अनुसार कोई योजना चला कर,ट्वीट करके अपना फ़र्ज़ पूरा कर देती हैं। साल बाद गूगल बाबा की कृपा से फिर दुनिया को याद आता है और फटाक से स्टेटस अपलोड हो जाता है।

आज भी आपको एक अपडेट मिला होगा। 10 अक्टूबर विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस( World Mental Health Day),इसे मनाने का मकसद है,मेन्टल डिसऑर्डर्स के लिए लोगो को जागरूक करना।1992 में रिचर्ड हंटर और वर्ल्ड फेडरेश फॉर मेन्टल हेल्थ ने मिलकर पहला वर्ल्ड मेन्टल हेल्थ डे मनाया था।आज इस संगठन के साथ 150 देश मेन्टल हेल्थ सम्बंधित विषयों पर काम कर रहे हैं।

खैर कम से कम एक दिन ही सही हम इतने गंभीर या कहे कि ज्यादा गंभीर होते मुद्दे पर बात तो करते है।ऑस्ट्रेलिया में तो इसे एक सप्ताह के रूप में अलग अलग थीम्स के साथ मनाया जाता है।

Mental health thedhibri

मेन्टल हेल्थ क्या है?

मेन्टल शब्द ही ऐसा है इसे सुनते ही लोग किसी बेवकूफ इंसान की कल्पना करने लगते है,पर मेंटल का भाव केवल मानसिक स्वास्थ से है।उसकी अच्छी व बुरी स्थिति के लिए अलग टर्म्स हैं,जिनको जानने की हमने कभी शायद ही कोशिश की होगी।

शरीर से पूरी तरह तन्दरूस्त,दिमाग से तेज़,हर मुश्किल को आसानी से हल करने वाला,समाज में अपना रोल बखूबी निभानेवाला इंसान मेंटली हेल्दी है,संक्षेप में कहे तो
पॉजिटिव बॉडी,पॉजिटिव माइंड।

अब इसके विपरीत परिस्थितियों वाला व्यक्ति मेन्टल डिसऑर्डर्स से प्रभावित हो सकता है। मेंटल इलनेस के कारण और लक्षण अलग अलग है।ये लक्षण कारण पर निर्भर करते है।

किसी एक चीज़ का मन में डर बैठ जाना(Phobias)
काम में मन न लगना,नींद न आना,चिड़चिड़ापन,अकेले रहना,बुरे ख्याल आना(Depression)
कभी ज्यादा खुश होना,कभी रोना,थके रहना(Bipolar Disorder)
बार बार किसी चीज़ को दोहराते रहना(Obsessive compulsive disorder)
ज्यादा भूख लगना,बिल्कुल भूख न लगना(Eating Disorder)
अकेले रहना,लोगों में असहज महसूस करना,कम बोलना(Autism)
भ्रमित रहना,व्यर्थ की कल्पनाएं करना (Ilusion & Hallucination)
नशे की लत (Drug Addiction)

अब आप इन लक्षणों को पढ़कर अपनी आदतों से जोड़कर चिंता न करने बैठ जाइयेगा।ये लक्षण सामान्य है आमतौर पर इस हम सबके साथ ये होता है पर कभी कभी।लेकिन ये व्यवहार लगातार बने रहना,लम्बे समय से ऐसा होना चिंता का विषय है।इस से आसानी से उभरा जा सकता है,बशर्ते आप खुद किसी मनोवैज्ञानिक को पागलों का डॉक्टर समझ कर इलाज से पीछे न हटें।

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मेन्टल हेल्थ टैबू,स्टिग्मा और स्टेटिस्टिक्स

मानसिक अस्वस्थता के कारणों के साथ अक्सर कोई न कोई कहानी जुड़ी होती है।पारिवारिक कलह,किसी की मृत्यु का आघात,असफलता,आर्थिक तंगी,प्रेम में ठुकराया जाना,जाति या रंगभेद के कारण,शोषण या कोई अन्य ऐसी घटना जो किसी मनुष्य पर गहरा प्रभाव छोड़ती हैं कि वह समाज से कटता चला जाता है।

कोरोना काल में अकेले रहने के कारण,आर्थिक तंगी व रोजगार की कमी के कारण कितने ही लोग डिप्रेशन के शिकार हुए हैं।बच्चें अटेंशन चाहते है और यदि कोई उन्हें नकारता रहे तो उनके मन पर गलत असर होता है। किशोरावस्था में वे दोस्तो में अपनी धाक जमाने,प्रतिस्पर्धा करने,दूसरों से तुलना करने लगते है और इसका नेगेटिव रिस्पांस उन्हें स्ट्रेस देने लगता है।

गर्भवती स्त्रियों में गलत दवाओं के सेवन व नशे की आदतों के कारण ये स्त्रियां अवसाद का शिकार हो जाती हैं।

15 से 30 साल का आयु वर्ग मानसिक उतार चढ़ाव को सबसे अधिक झेलता है।मनोचिकित्सक व मनोवैज्ञानिक का नाम सुनते ही लोग कहते है,हमारा बच्चा पागल थोड़े ही है जो उसे उनके पास लेकर जाए।।पागलों का डॉक्टर,ये हमारी ही बनाई व फैलाई गई गलत बातें हैं।लोग मानसिक रोगों को भूत प्रेत का साया,पागलपन समझ कर गलत गलत तरीके अपनाने लगते हैं,जबकि यह सब तरीके इसके इलाज का हिस्सा नही है।

समाज में हर एक चीज़ को लेकर अनेकों मिथ है,लोग मानसिक बीमारी को एक कलंक मनाने की गलती करते हैं।यह भी उसी का एक उदहारण है। किसी व्यक्ति के मानसिक रोग जैसे शब्द का प्रयोग भी हमारा समाज आपत्तिजनक मानता है।

हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है,जिसका मूल कारण डिप्रेशन है।40 फीसद लोग ऐसे है जिन्हें नींद न आने की शिकायत रहती है,हर पांचवा व्यक्ति भारत में अवसाद का शिकार होता जा रहा है।

2019 में 7.5 प्रतिशत आबादी मानसिक रोग से प्रभावित थी,और 2020 में इसके 20 फीसदी तक पुहंचने की बातें कही गई थी।WHO का कहना है कि वर्तमान स्तिथि के अनुसार ये मामले 2030 तक दुगने हो सकते है।अब सरकार तो काम कर रही है और कर ही रही है 1987 से इस पर।

अब 2017 में भी मानसिक स्वास्थ देखभाल अधिनियम लागू कर दिया गया और 1987 वाले मानसिक स्वस्थ अधिनियम को खारिज कर दिया गया।अधिक से अधिक जागरूकता के लिए जिला स्तर पर भी कई जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम भी चलाये गए।भारत में दस लाख लोगों के लिए केवल 3 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं। मेन्टल हेल्थ के लिए फंड्स की बात की जाए तो वह सागर में एक लोटा पानी मिलने वाली बात है।

इसके अलावा WHO ने भी सभी वर्गों के लिए अलग अलग जागरूकता प्रोग्राम चलाये हुए हैं।

हम क्या कर सकते हैं?

मेन्टल हेल्थ विशेषज्ञ कहते है कि हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में एक बार मानसिक असंतुलन की ओर बढ़ता है।आसपास का माहौल,लोगों का व्यवहार ये दो तो सबसे अहम कारण हैं अवसाद और अन्य मानसिक समस्याओं के। आपसी मेलजोल,बात करना,एक दूसरे की समस्याओं को सुनाना,सुझाव देना ऐसी चीज़े करने से ऐसे लोगों की मदद की जा सकती है।

ये आपके खुद के लिए भी फायदेमंद है।व्यायाम करे,अच्छी किताबें पढ़े,म्यूजिक सुनिए अपने अंदर पैदा होती हीन भावना को ख़त्म करिए।बच्चों की भावनाओं को समझें उनके जीवन में हो रहे बदलावों के बारे में उन्हें बताए।किसी डॉक्टर की सलाह ले,लोगों की बातें के बारे में सोच कर अपने स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करे। हम सब के जागरूक होने से ही इस समस्या का समाधान हो सकता है।


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