एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं

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अंग्रेज़ी शासन के दौरान पंजाब के होशियारपुर में 24 मार्च 1928 के दिन पहली किलकारी भरने वाला ये छोटा सा बच्चा एक दिन दुनिया की सबसे क्रूर और दकियानूसी सरकारों के ख़िलाफ़ भी बेख़ौफ़ होकर बोलेगा ये किसने सोच होगा।
भले ही हबीब जालिब बंटवारे के बाद परिवार के दबाव में पाकिस्तान चले गए हों मगर सरहद के दोनों तरफ़ जब भी सरकारों ने अपनी मनमानी करने की कोशिश की दूर कहीं से आती हुई एक सुरंगनुमा आवाज़ हमारे ज़हन में उठती है और हम बोल पड़ते हैं – “मैं नहीं मानता,मैं नहीं जानता”

हबीब जालिब (24/03/1928 – 12/03/1993

पाकिस्तान में सरकारें बदलती रहीं लेकिन अगर कुछ नहीं बदला तो वो था सरकार की तानाशाही और जालिब का लहजा। जब अदब के सारे सिपाही सरकार की हाँ में हाँ मिलाते हुए नज़र आ रहे थे और सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वाले हर शख़्स को जेल में डाल दिया जा रहा हूँ उस वक्त जालिब कहते हैं –

“कुछ भी कहते हैं कहें शह के मुसाहिब जालिब
रंग अपना यही रखना, इसी सूरत लिखना”

जनरल अय्यूब खान से लेकर बे-नज़ीर भुट्टो तक किसी की भी तानाशाही जालिब के तेवर कम न कर सके।
अय्यूब खान की तानाशाही के दौर में लिखी उनकी नज़्म तो जैसे कौमी तराना बन गयी और बच्चे बच्चे की ज़ुबान पर चढ़ गई, पढ़िए दस्तूर –

दीप जिस का महल्लात ही में जले
चंद लोगों की ख़ुशियों को ले कर चले
वो जो साए में हर मस्लहत के पले
ऐसे दस्तूर को सुब्ह-ए-बे-नूर को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

मैं भी ख़ाइफ़ नहीं तख़्ता-ए-दार से
मैं भी मंसूर हूँ कह दो अग़्यार से
क्यूँ डराते हो ज़िंदाँ की दीवार से
ज़ुल्म की बात को जहल की रात को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहो
जाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहो
चाक सीनों के सिलने लगे तुम कहो
इस खुले झूट को ज़ेहन की लूट को
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

तुम ने लूटा है सदियों हमारा सुकूँ
अब न हम पर चलेगा तुम्हारा फ़ुसूँ
चारागर दर्दमंदों के बनते हो क्यूँ
तुम नहीं चारागर कोई माने मगर
मैं नहीं मानता मैं नहीं जानता

हबीब जालिब

हबीब जालिब उन शायरों में शुमार रहे हैं जिन्हें नज़्म और ग़ज़ल दोनों में बराबर की महारथ हासिल है –

झूटी ख़बरें घड़ने वाले झूटे शे’र सुनाने वाले
लोगो सब्र कि अपने किए की जल्द सज़ा हैं पाने वाले

दर्द आँखों से बहता है और चेहरा सब कुछ कहता है
ये मत लिक्खो वो मत लिक्खो आए बड़े समझाने वाले

ख़ुद काटेंगे अपनी मुश्किल ख़ुद पाएँगे अपनी मंज़िल
राहज़नों से भी बद-तर हैं राह-नुमा कहलाने वाले

उन से प्यार किया है हम ने उन की राह में हम बैठे हैं
ना-मुम्किन है जिन का मिलना और नहीं जो आने वाले

उन पर भी हँसती थी दुनिया आवाज़ें कसती थी दुनिया
‘जालिब’ अपनी ही सूरत थे इश्क़ में जाँ से जाने वाले

– हबीब जालिब

हबीब जालिब मुशायरे में पढ़ते हुए

हबीब जालिब ने सरकारी तानाशाही और कौमी कट्टरता दोनों के ख़िलाफ़ एक ही सख़्त लहजे में लिखा। जिस वक्त पाकिस्तान में मौलवियों के ख़िलाफ़ बोलने भर से आपको जीते जी जहन्नुम देखनी पड़ सकती थी उस वक़्त जालिब कहते हैं –

“ख़तरा है ज़रदारों को, गिरती हुई दीवारों को
सदियों के बीमारों को, ख़तरे में इस्लाम नहीं”

पढ़िए हबीब जालिब की नज़्म ‘मौलाना’ –

बहुत मैं ने सुनी है आप की तक़रीर मौलाना
मगर बदली नहीं अब तक मिरी तक़दीर मौलाना
ख़ुदारा शुक्र की तल्क़ीन अपने पास ही रक्खें
ये लगती है मिरे सीने पे बन कर तीर मौलाना
नहीं मैं बोल सकता झूट इस दर्जा ढिटाई से
यही है जुर्म मेरा और यही तक़्सीर मौलाना
हक़ीक़त क्या है ये तो आप जानें या ख़ुदा जाने
सुना है जिम्मी-कार्टर आप का है पीर मौलाना
ज़मीनें हों वडेरों की मशीनें हों लुटेरों की
ख़ुदा ने लिख के दी है ये तुम्हें तहरीर मौलाना
करोड़ों क्यूँ नहीं मिल कर फ़िलिस्तीं के लिए लड़ते
दुआ ही से फ़क़त कटती नहीं ज़ंजीर मौलाना

– हबीब जालिब

हबीब जालिब हर दौर में प्रासंगिक रहे हैं और हमेशा रहेंगे, उस अनंत काल तक जब तक दुनिया के किसी भी कोने में सरकारी तंत्र कहे जाने और सुने जाने की आज़ादी को छीनने की कोशिश करेंगे

“एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं”

– हबीब जालिब


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himanshu pandey

ये लड़के बीस बाइस के

8 thoughts on “एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं

  • July 14, 2020 at 7:15 am
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    वाह । बहुत खूबसूरत और बहुत ही शानदार तरीके से आपने शायर की शख्सियत को बयां किया है । ज़िंदाबाद ❤️❤️❤️

    Reply
  • July 14, 2020 at 7:53 am
    Permalink

    उम्दा।??

    Reply
  • July 15, 2020 at 5:17 pm
    Permalink

    ??❣️❣️❣️???

    Reply
  • July 17, 2020 at 10:09 am
    Permalink

    एक कॉलम अलग से सिर्फ क्रन्तिकारी रचनाओँ के लिए बनाएं। ….
    बाकी बहुत अच्छा लिखा है,

    Reply

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